Tuesday, 10 June 2014

भय (Fear - a short story)

"क्या ये संभव है? मुझे तो यह संभव ही नहीं लगता है|" मैंने कह तो दिया, पर मुझे स्वयं अपनी आवाज़ खोखली लगी| मानो मैं स्वयं को बहलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था| पर क्या करता| मुझे किसी भी हालत में पैसों का इंतजाम होता नहीं दिख रहा था| डॉक्टर ने साफ़ साफ़ कह दिया था की बिना पैसों के वो कुछ नहीं कर सकता| आज जब एक उम्मीद की किरण दिखायी दी भी तो उसमें खतरा बहुत था| उसके कितना भी कहने पर भी मुझे ये काम संभव नहीं लग रहा थ| मैं जानता था की भले ही यह काम संभव ना लगे, मेरे पास इसमें शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं था| जब मेरे प्रश्न की कोई प्रतिक्रिया ना हुई, तो मुझे हाँ करनी पड़ी|

दस दिनों के बाद मुझे जेल में ख़बर लगी की इलाज ना होने की वजह से वो चल बसी| अब मेरी आँखों के सामने छाया अँधेरा छंट चुका था| मैंने लगभग संतोष की साँस ली| अब मुझे जेल या फाँसी की सजा का कोई भय नहीं था| मैं हंस पड़ा| दस दिनों पहले उसके इलाज ना होने के जिस भय ने मुझे जेल में डाला था, आज उस भय से छुटकारा मिल गया था| आज जेल में होते हुए भी मैं अपने को आज़ाद समझ रहा था|

- विनय कुमार पाण्डेय
1 अप्रैल 2014