Monday, 11 January 2016

तरक्की - Short story in hindi

“क्या? तुम अपने कंप्यूटर पर कमांड लिख कर उसका प्रयोग करते हो? कौन से युग से हो भाई?” उपहास करते हुए समय यात्री ने कंप्यूटर पर बैठे वैज्ञानिक से कहा।

“अपनी बात करो, तुम भी आदि काल के लगते हो जो ये माउस चला कर काम कर रहे हो” दूसरे समय यात्री ने पहले का मज़ाक उड़ाया।

“पहले अपने आप को तो देख लो, उँगलियों से अपने इस छोटे से कंप्यूटर का उपयोग करने वाले, तुम भी बहुत उन्नत नहीं हो। मुझे देखो, मैं अपने कंप्यूटर को आदेश देता हूँ और वह मेरी बात सुनकर काम करता है।“ तीसरे समय यात्री ने दूसरे का मज़ाक उड़ाया।

“जरा यहाँ भी देख लो तुम लोग, मैं सिर्फ़ सोच कर अपने कंप्यूटर को आदेश दे सकता हूँ। इसलिए मेरे समक्ष तुम सभी आदिमानव हो।“ चौथे समय यात्री ने भी अपनी तरक्की की डींग हाँकी।

सभी पाँचवें समय यात्री की और देखने लगे, की वह क्या कहता है। पाँचवें समय यात्री ने सबको अपनी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखते हुए पाया तो शांति से उत्तर दिया, “मैं स्वयं कंप्यूटर हूँ, मानव जाति ने तरक्की तो बहुत की, परंतु अपने घमंड की वजह से अपनी प्रजाति को बचा नहीं पाए।“

विनय पाण्डेय
11 जनवरी 2016

Saturday, 3 October 2015

समर शेष है

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

ना जाने क्यों दिनकर जी की यह कविता आज बहुत याद आ रही हैं। शायद यह कविता अधूरी है। आज सिर्फ़ व्याध नहीं है, बल्कि व्याध के साथ खड़े लोगो का हुजूम भी है, जो उन्हें शाबाशी देता है, और दूसरों को तटस्थ रहने या फिर बहलाने का काम भी करता है। वह स्वयं कुछ नहीं करते, बस व्याघ्र का पक्ष लेकर उन्हें रक्षक घोषित करवाने में मदद करते है। वह ऐसे लोग है, जिन्हे उत्तर प्रदेश की घटना एक दुर्घटना लगती है, और साथ में मीडिया पर इस दुर्घटना को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप भी लगाते है। वह ऐसे भी लोग है जो इस आतंकवाद के लिए पीड़ित परिवार को ज़िम्मेवार ठहरा रहे है। मैं अधिक नहीं लिख पाऊँगा, क्योंकि मैं स्वयं तटस्थ वाली श्रेणी में आता हूँ। शायद मुझे आज इस सांप्रदायिकता और धर्मांधता के खिलाफ़ लड़ाई शुरू कर देनी चाहिए। पर मैं ठहरा एक साधारण इंसान, दो वक़्त की रोटी कमा कर अपने और अपने परिवार का पेट पालने वाला, यदि समर में कूद गया, तो मेरे परिवार का क्या होगा! इसी स्वार्थ की वजह से मैं यह अन्याय देखकर भी चुप रह जाता हूँ। यहाँ फेसबुक पर लिखना सिर्फ़ अपने मन को बहलाना होता है। मुझे पता है की यहाँ किए गए विरोध की कोई कीमत नहीं होती। इसलिए यहाँ लिखे गए अपने पोस्ट को मैं विरोध नहीं मानता और अपने को तटस्थ की श्रेणी में ही रखता हूँ। 

मैं दोषी हूँ, तटस्थ रह कर सब कुछ देखने का, और सहने का दोषी। इतिहास मेरा भी अपराध लिखेगा। शायद इतिहास मेरी मजबूरी ना लिख पाए, पर अपराध अवश्य लिखेगा। मैं तब भी चुप था जब एक आतंकवादी के मरने पर जुलूस निकाल कर सैकड़ों की संख्या में शक्ति प्रदर्शन किया गया। मैंने तब भी आवाज़ नहीं उठाई जब लोगो के खाने पीने की पसंद पर रोकथाम लगाई गई, और आज भी चुप हूँ जब आतंकवादियों की भीड़‌ ने (जिन्हे मासूम बच्चे कहा जा रहा हैं) एक परिवार के मुखिया को बिना किसी वजह के पीट पीट कर मार डाला, और उस परिवार को बेसहारा बना दिया। और अपने स्वार्थ की वजह से शायद मैं भविष्य में भी चुप ही रहूँगा। 

दिनकर जी, मैं माफ़ी चाहूँगा, कि स्कूल में पढ़ी आपकी कविता याद तो रही, पर आत्मसात करने की हिम्मत ना रही। मैं क्षमा प्रार्थी हूँ अपने देशवासियों से, जो आज भुक्त भोगी है इस धर्मांधता के, और शायद उम्मीद करते है की मुझ जैसे नागरिक आगे आएँगे। उम्मीद छोड़ दे, हम अपने परिवार की रक्षा करने में भी असमर्थ है, आपकी रक्षा कैसे करेंगे? 

दुःखी अंतःकरण एवं क्षमा याचना के साथ, एक साधारण माध्यम वर्गीय भारतीय नागरिक।

Sunday, 23 August 2015

सुरक्षा भुगतान (Short story in Hindi)

एक  समय की बात हैं। एक राज्य में विदेश से एक व्यापारी आया। उसने राजा से वहाँ अपना व्यापार करने की अनुमति माँगी। राजा ने अनुमति दे दी एवं कहाँ कि उनके मंत्री इस राज्य में व्यापार करने के नियम बता देंगे। व्यापारी ने मंत्री से मुलाक़ात की एवं सभी नियम समझ लिए। उन नियमों के अलावा मंत्री ने उस व्यापारी को यह भी बता दिया था कि उस राज्य में व्यापार करने पर कुछ खास किस्म के कर देने पड़ेंगे, राजकीय अनुमति हेतु कर, उत्पादक गुणवत्ता जांच में पारित होने हेतु कर एवं सरकारी महकमों की अलग अलग किस्म की जांच से सुरक्षा हेतु कर। यह सभी कर अघोषित थे एवं बिना किसी रसीद के देने पड़ते थे। विदेशी व्यापारी ने सभी शर्तें मंज़र कर अपना व्यापार “निशाले” के नाम से शुरू किया। बहुत जल्दी ही उसका व्यापार चल निकला और लोग उसके बनाए उत्पादों को पसंद करने लगे। फिर वह व्यापारी विदेश से ही अपना यहाँ का व्यापार देखने लगा। यहाँ उसने कुछ अधिकारी नियुक्त कर दिये थे, जो उसके व्यापार की देखभाल करते थे। धीरे धीरे “निशाले” के नए नए उत्पाद बाज़ार में आने लगे, और लोगो में इन उत्पादों की प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई कि लोग “निशाले” को बाहर का नहीं, बल्कि अपने राज्य का ही उत्पादक मानने लगे। इन सभी उत्पादों में सबसे अधिक प्रचलित “मिगा” था, जो बिना मेहनत के तैयार होने वाले पौष्टिक खाद्य के रूप में बेचा जाता था। असल में वह पौष्टिक नहीं था, पर उन अघोषित करो की वजह से उसे पौष्टिक पदार्थ घोषित कर दिया गया था। इसीलिए, “निशाले” के अधिकारी भी राज्य के घोषित एवं अघोषित नियम मानते हुए शांति से अपना व्यापार कर रहे थे। बाहर विदेश में बैठे व्यापारी को अब अघोषित कर कुछ चुभने से लगे थे। परंतु वह किसी प्रकार की कठिनाई से बचने के लिए लगातार उन करो का भुगतान करता रहता था। वैसे भी उन करो से होने वाली हानि को वह अपने उत्पादों की गुणवत्ता में गिरावट कर के पूरा करता था। उसे सरकारी जाँच का भय नहीं था, क्योंकि उसके लिए भी नियमित रूप से अघोषित कर दिया जा रहा था। 

Saturday, 8 August 2015

कारवाँ – ग्राफिक नॉवेल (हिंदी)

याली ड्रीम्स की अँग्रेजी में प्रकाशित और प्रशंसित ग्राफिक नॉवेल कारवाँ अब हिंदी में उपलब्ध हो गयी है। आजकल के सभी नए कॉमिक्‍स प्रकाशक अपनी किताबें अँग्रेजी में ही प्रकाशित करते है। यह उनकी विवशता है, क्योंकि नए प्रकाशक के पास उत्तम कहानी और चित्रांकन तो है, परंतु प्रकाशित पुस्तकों के वितरण का उपयुक्त साधन नहीं है। उन्हें कॉमिक कान या फिर ऑनलाइन स्‍टोर्स पर निर्भर रहना पड़ता है। फिर उत्तम श्रेणी की कहानी, कला एवं रूप-सज्जा देने पर पुस्तक का मूल्य भी अधिक होता है। हिंदी में पाठकों की संख्या तो है, परंतु अधिक पैसे खर्च करके नए प्रकाशक की कॉमिक्‍स लेने वाले पाठक कम है। ऊपर से बिना देखे, ऑनलाइन खरीदने वाले तो और भी कम है। ऐसे में अँग्रेजी के पाठक तुलनात्मक रूप से अधिक हैं। यही कारण है कि आज हरेक प्रकाशक अँग्रेजी में ही अपनी कॉमिक्‍स प्रकाशित कर रहा है। भले ही कहानियाँ शुद्ध देशी है, पर भाषा विदेशी है। यह एक विडंबना है, जिसे आज प्रकाशक और हिंदी पढ़ने वाले पाठक, दोनों को झेलना पड़ता है।

ऐसा नहीं है कि हिंदी में कॉमिक्‍स एकदम प्रकाशित नहीं होती। राज कॉमिक्‍स आज भी हिंदी में कॉमिक प्रकाशित करते है। परंतु उनके किरदार पहले से स्थापित है। सुपर हीरो है। उनका पाठक वर्ग बना हुआ है। और सबसे बड़ी बात, उनके पास अपनी किताबों को हर जगह पहुँचाने की सुविधा भी है। पर बस एक ही प्रकाशक है, पाठकों के पास कोई और विकल्प नहीं है। भले ही नए प्रकाशक की पुस्तक बहुत ही उम्दा स्तर की हो, उसे पढ़ने कि इच्छा अँग्रेज़ी में पढ़ कर ही पूरी करनी पड़ती है।

Wednesday, 5 August 2015

The Ban Culture!

I am in favor of censorship in movies, television and any other medium which is exposed to kids. But the real reason behind that are kids, as they are not mature and we need to decide what they should and should not consume in the name of entertainment. I am not in favor of censorship for adults. Which means my support for censorship is only for ratings, to provide us detail on what to expect, and if that is suitable for kids. If we are mature enough to elect our government, how can the same government decide what we should or should not do? I am not interested in Porn, but I don’t regularly eat Beef as well. That does not mean it should be banned! Because I know, today it is Beef and Porn, tomorrow it would be something which will directly impact me!! I should not wait for that tomorrow to come, and protest now. 

I didn’t go out and search for beef in Mumbai, but I am sure I will find it for a premium price. Gutka or chewing tobacco is banned as well, but you go to almost any cigarette or pan shop asking for it, and you will get that. Similarly, smoking is banned at public place, but you just go to any open public place, and look around!! You will understand what I am trying to tell. Last night, I just tried accessing one of the banned site, and its working! Not directly, but a simple search in google will let you know various ways of accessing it instantly. The site itself is disgusting, but for those who like it, the site is still accessible. 

Thursday, 30 July 2015

फाँसी (A short story in Hindi)

उसकी फाँसी की सज़ा तय हो चुकी थी। बीस वर्षों कि कानूनी ज़द्दोज़हद के पश्चात अब बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। परसों उसे फाँसी होनी थी। आज उससे मिलने उसकी 21 साल की बेटी आ रही थी। आख़िरी बार वह उससे 3 साल पहले मिली थी, और आज तक उसके अपनी बेटी के कहे शब्द याद थे। 

"आपने अपना रास्ता ख़ुद चुना है, और मेरे या माँ के बारे में सोचे बिना चुना है। आपका रास्ता आपको मुबारक हो। मुझे आपसे यह नहीं समझना है कि आपने 300 लोगो की जान किस वजह से ली है। मुझे नहीं लगता कि मैं आपकी वजह को समझ पाऊँगी। मुझे अपनी ज़िंदगी जीना है, और आपके नाम की वजह से मुझे हर जगह घृणा और दुत्कार का सामना करना पड़ा है। आज से मैं अपने आप को आपसे अलग कर रही हूँ। आपको जो सही लगा वह आपने किया, अब मुझे जो सही लग रहा है, वो मैं कर रही हूँ। मैंने आपसे सफ़ाई नहीं माँगी और मुझे आपको किसी तरह की सफ़ाई देने की जरूरत नहीं है। मेरा खुदा जानता है कि मैंने आपसे कितना प्यार किया है, कि मैं आपको बेगुनाह समझती रही हूँ। जब भी मुझे एक आतंकवादी के बेटी कहा जाता था, मैं आपके लिए लड़ी हूँ। पर अब और नहीं। मैं अपने खुदा से आपके लिए दुआ माँगूँगी की फाँसी पर चढ़ने से पहले वह आपको सही गलत की समझ दे, ताकि आप उन 300 लोगो के लिए कम से कम एक आँसू तो बहा सके। मैं आपके खुदा को नहीं जानती, और ऐसे खुदा को नहीं मानती जो इन्सानो की हत्या करने पर जन्नत देता हो। इसलिए मैं अपने खुदा से दुआ करूँगी, आपके खुदा से नहीं।"

Sunday, 14 June 2015

माँ (A short story in Hindi)

आज मेरे कलकत्ता प्रवास का आख़िरी दिन था। कल फिर ट्रेन पकड़ कर वापस मुंबई आना था और समान बांधने की तैयारी की जा रही थी। इस बार की छुट्टियों में और कुछ हुआ हो या नहीं, मुझे यह पता चल गया था कि मुझे शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों है। अब दवाइयाँ शुरू हो चुकी थी और उम्र भर चलनी थी। माँ पिछले 3 घंटों से गायब थी। मैंने माना किया था कि इतनी दोपहर में कही जाने की जरूरत नहीं है। मैं मुंबई जा रहा था, वहाँ हर वह चीज़ मिलती है जो कलकत्ता में मिलती है। मैंने माँ को साफ़ कह दिया था की मैं समान नहीं बढ़ाऊँगा। फिर भी माँ कही बाहर निकाल गई थी। वह जानती थी कि यदि मुझे पता चला तो मैं जाने नहीं दूँगा, इसलिए चुप चाप बिना बताए चली गयी थी। इसी चक्कर में अपना मोबाइल भी नहीं ले गई थी। घर में सभी परेशान थे। मैं चिल्ला रहा था कि जो भी वो लाएगी बेकार जाएगा क्योंकि मैं कुछ भी ले जाने वाला नहीं हूँ। घर में सब मेरे गुस्से को जानते थे, इसलिए समझाने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि माँ आख़िर माँ होती है, बस उस पर चिल्लाना मत। समान नहीं ले जाना है, मत ले जाओ, पर चिल्ला चिल्ली मत करना। 

जब माँ आई तो मेरा गुस्सा उसका गर्मी से क्लांत चेहरा देख कर और बढ़ गया। बाहर 40 डिग्री गर्मी में इस उम्र में उसे क्या जरूरत थी बाहर जाने की। दरअसल मेरा गुस्सा मेरी मजबूरी की वजह से था कि ना तो मैं उसे रोक सका था और ना ही मोबाइल पर फ़ोन कर वापस बुला सका था। 

इससे पहले मैं उसपर चिल्ला पाता, उसने मेरे सामने एक डिब्बा रखते हुए कहा, “यह लो शुगर फ्री रसगुल्ला।“ 
मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ गई। माँ ने इस बार मुझे मिठाई नहीं खिलाई थी, शुगर की वजह से। वह इस गर्मी में मेरे लिए बिना शक्कर वाली मिठाई लेने गई थी। बहुत मुश्किल से मैंने अपनी आँखों को बहने से रोका। मुझे कुछ ना कहते या करते देखकर माँ ने अपने हाथों से एक रसगुल्ला मेरे मुंह में दाल दिया। थोड़ी देर पहले इतना चिल्लाने वाला मैं, कुछ भी बिना कहे रसगुल्ला खाने लगा।

विनय पाण्डेय
१४ जून २०१५