Thursday, 26 March 2015

Thank You Team India


Today, World Cup Cricket 2015 ended for us. We lost to Australia in Semi Final, and are out of game. I am not going to analyze the game, and provide insight on why we lost, and what we could have done better. Every cricket fan knows what went wrong, and everyone has opinion, suggestions and what not, about how we could have won. So, there is no point writing about it. 

I am going to write about my feelings, and good feelings, proud feelings about our team. The Indian cricket team. The M S Dhoni and his boys in Blue! They lost the game, but won our heart! The overall performance in this tournament by our team was outstanding. They came as a weak team, and no one was even ready to accept that they will reach Quarter Finals. I remember, their first game was with Pakistan, and we were wishing for that one match win. No one was expecting team India to defend their title. This was because of their recent bad performance in Australia. The team was not at all in form, and was losing matches like anything. They just lost to Australia in test cricket.

But, what they started with their first game against Pakistan was astonishing, and to everyone’s surprise, that performance and roaring victory over victory continued, matches after match, till it ended in Semis. 

We repeated history when we defeated Pakistan, and we changed history when we defeated South Africa. The team played like winners, hunted the opponents in packs, getting them all out in every match. Yes, we got all wickets in each of our matches, again, only till Semi Final. Here, we lost out to Australia by giving away all of our wickets, we got all out.

Monday, 16 March 2015

अंतिम निर्णय (A short story in Hindi)


"उसकी आत्मा इस शरीर में कैद है। आप उसे मुक्ति दे दीजिए ताकि वो एक नया शरीर पा सके।"

इन शब्दों ने रामलाल को अपने विचारों से बाहर खींचा। वो एक ऐसे प्रश्न का उत्तर ढूँढने की कोशिश कर रहे थे, जो कभी उत्तरित हुआ ही ना हो। कैसे एक पिता अपने जवान पुत्र के मृत्युनामे पर स्वीकृति दे सकता है?

उनके सामने रखा था वह कागज़, जिसपर कृत्रिम श्वास नलिका हटाए जाने पर उन्हें स्वीकृति के हस्ताक्षर करने थे। हलके हवा के झोंके से वह कागज़ फड़फड़ा रहा था। मानो आत्मा शरीर से निकलने की कोशिश कर रही हो। उसी फड़फड़ाहट की आवाज़ के साथ सिनेमा के प्रोजैक्शन रूम में चली रही मशीन की तरह उनकी आँखों में चल-चित्र की भाँति चल रहा था उनके पुत्र का जीवन।

बचपन की शरारत की झलकियों ने उनके चेहरे पर इस दुखद घड़ी में भी मुस्कान फेर दी। फिर जवानी की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, देर रात तक घर से बाहर और अपने साथ हुई तू तू मैं मैं याद करते करते मन में एक बार फिर मोह से प्रेरित आवाज़ उठी।

"नहीं, मैं अपने बेटे को नहीं मार सकता। वो अभी ज़िंदा है। वो ठीक हो सकता है। मुझे और कोशिश करनी चाहिए।"

Sunday, 15 March 2015

Amitabh Bachchan – A Super Star we love but don’t go to watch his movies

Amitabh Bachchan is Super Star, or the living legend or Star of the millennium or not sure whatever names given to him. But, that does not translate to the box office register. People don’t go and watch his movies. They like him; there is no doubt about it. His game show KBC is a hit, his appearances on other TV reality shows are liked by people, his advertisements are hit, but his movies are not. 


This is interesting to note, that he still command a large fan followings, and ranked #3 in Times of India Celebrity Index in January 2015. He has always been in Top 10, and was #1 in April 2014. 

He has 13.6 million followers on Twitter, 19.8 million followers on Facebook, and his blog is also read by millions of people regularly, including media giants. Anything he says, post or share becomes news, as media recognize that people do like to read or see him in news.  

Monday, 9 March 2015

रेखाएँ (A short poem in Hindi)


This poem is about the lines drawn by artists on paper. I am a comics fan, and this short poem is dedicated to the lines drawn by comics artists to create new and magical world on paper. Once these lines are drawn on black pages, these pages will tell you a story with heroes, villains, and the story will have its own world, with various emotions, drama etc. to entertain us. The artist simply creates a new world of possibilities with few lines. This message is expressed in the poem presented. 





कुछ रेखाएँ कोरे कागज़ पर पड़कर,

उस कागज़ का रूप बदल देती है।

Sunday, 8 March 2015

India’s Daughter – A mirror to our society

Today is international Women’s Day, and BBC wanted to launch their new documentary India’s Daughter today all over the world. This documentary is banned by Indian government, but still available at various platforms, and lots of people have seen it. I think the ban is not justified, as it is like banning a mirror which shows our true face. It’s more like few of those discussions we always try to avoid. This documentary brings out the topics which we don’t want to discuss. So, the better way to avoid such discussions is to ban it, and no one will talk about it. 

The documentary is not offering anything new to the Indian viewer. We all more or less know these things already. To put everything into context before we discuss this, here is a summary of what is shown in the documentary.

Friday, 6 March 2015

होली का उपहार (A short story in Hindi)

कल होली है। आज ऑफिस से निकाल कर घूमते घूमते मुख्य बाज़ार तक पहुँच गया। मैं अपने घर से दूर यहाँ एक अनजान शहर में पिछले २ सप्ताह से पड़ा हुआ था। अकेले यहाँ किसके साथ होली खेलता? घर वाले तो फिर भी होली खेल ही लेंगे। बार बार मन में एक ही खयाल आ रहा था, यदि अभी मैं घर पर होता तो शायद बच्चों के साथ बाज़ार में होता। वो अपनी पसंद के रंग और पिचकारियाँ खरीदने के लिए जिद कर रहे होते, और मैं दुकान वाले से भाव ताव करके उनके लिए रंग-पिचकारी एवं अपने लिए गुलाल ले रहा होता। आजकल पिचकारियाँ भी तो अलग अलग तरह की आ गयी है। कुछ में तो पानी के लिए अलग से डिब्बे लगे हुए है।  सोचते सोचते मेरी निगाह रंग बिरंगी पिचकारियों से सजे दुकानों से होती हुई पास खड़े कुछ बच्चों पर पड़ी, जो बड़ी ही लालसा भरी निगाहों से उन दुकानों को देख रहे थे। कुल ५ बच्चे थे, तकरीबन ६ से ८ वर्ष की उम्र के। उनकी वेश भूषा देख कर ऐसा लगता था की वह बहुत गरीब परिवार से थे, या शायद भिखारी भी हो सकते थे। तुरंत ही मैंने अपने आप को दुरुस्त किया। यदि वो भिखारी होते तो दूर से ललचाई निगाहों से निहारने की बजाय वो दुकानों से ख़रीदारी करने वालों लोगो से भीख मांग रहे होते। वह गरीब तो लग रहे थे, पर भिखारी नहीं। शायद उनके माँ-पिता इतना नहीं कमाते होंगे की महँगी पिचकारियाँ ले सके। 

होलिका दहन (A short story in Hindi)

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। इस अवसर पर एक छोटी सी कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ, होलिका दहन, जिसमे कोशिश की है होलिका के अंतर्द्वंद्व की झलक प्रस्तुत करने की। उम्मीद है आप इसे पसंद करेंगे। 


होलिका के मन में एक अंतर्द्वंद्व चल रहा था। आज उसे अपने वरदान का उपयोग करके एक बच्चे की हत्या करनी थी। और बच्चा भी कौन, उसका अपना भतीजा। बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना उसका कर्तव्य था। परंतु क्या जो वो कह रहे थे, वह सही था? क्या प्रह्लाद को अपने प्रभु की वंदना करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? स्वयं हिरण्यकश्यप ने भी तो ब्रह्मा की तपस्या की थी, अपने लिए अक्षय जीवन का वरदान लेने के लिए। फिर अगर प्रह्लाद विष्णु की उपासना करता है, तो इसमें गलत क्या है? 

परंतु वह जानती थी की अहंकार में डूबे उसके भाई को उचित अनुचित या तार्किक बात समझ में नहीं आएगी। उसे पता था की यदि वह अपने भाई की आज्ञा का उलंघन करती है, तो उसके भाई के अहंकार को ठेस पहुँचेगी, एवं उसके क्रोध के प्रकोप से वह भी नहीं बचेगी। 

होलिका ने एक निश्चय किया, उसने अपने हृदय को कठोर कर लिया था। अब उसे पता था की क्या करना है। अपने भाई की आज्ञा का पालन करते हुए वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि शय्या पर बैठ गयी। इससे पहले की अग्नि की लपट उनको अपने लपेटे में लेती, उसने प्रह्लाद को स्नेह किया, और अपना अग्नि रक्षक शाल उसे ओढ़ा दिया। 

यह जानते हुए भी की बिना उस शाल के वह स्वयं अग्नि से बच नहीं पाएगी, उसके अधरों पर मुस्कान थी। उसने वही किया था जो सही था। उसने अपने भाई की आज्ञा का अनादर नहीं किया, परंतु अपने भतीजे की हत्या भी नहीं की। अग्नि की लपट उसे अपने अंदर समेट रही थी, और वह हल्की मुस्कान लिए अपने ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत होने को तैयार थी।

विनय कुमार पाण्डेय
६ मार्च २०१५