Thursday, 30 July 2015

फाँसी (A short story in Hindi)

उसकी फाँसी की सज़ा तय हो चुकी थी। बीस वर्षों कि कानूनी ज़द्दोज़हद के पश्चात अब बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। परसों उसे फाँसी होनी थी। आज उससे मिलने उसकी 21 साल की बेटी आ रही थी। आख़िरी बार वह उससे 3 साल पहले मिली थी, और आज तक उसके अपनी बेटी के कहे शब्द याद थे। 

"आपने अपना रास्ता ख़ुद चुना है, और मेरे या माँ के बारे में सोचे बिना चुना है। आपका रास्ता आपको मुबारक हो। मुझे आपसे यह नहीं समझना है कि आपने 300 लोगो की जान किस वजह से ली है। मुझे नहीं लगता कि मैं आपकी वजह को समझ पाऊँगी। मुझे अपनी ज़िंदगी जीना है, और आपके नाम की वजह से मुझे हर जगह घृणा और दुत्कार का सामना करना पड़ा है। आज से मैं अपने आप को आपसे अलग कर रही हूँ। आपको जो सही लगा वह आपने किया, अब मुझे जो सही लग रहा है, वो मैं कर रही हूँ। मैंने आपसे सफ़ाई नहीं माँगी और मुझे आपको किसी तरह की सफ़ाई देने की जरूरत नहीं है। मेरा खुदा जानता है कि मैंने आपसे कितना प्यार किया है, कि मैं आपको बेगुनाह समझती रही हूँ। जब भी मुझे एक आतंकवादी के बेटी कहा जाता था, मैं आपके लिए लड़ी हूँ। पर अब और नहीं। मैं अपने खुदा से आपके लिए दुआ माँगूँगी की फाँसी पर चढ़ने से पहले वह आपको सही गलत की समझ दे, ताकि आप उन 300 लोगो के लिए कम से कम एक आँसू तो बहा सके। मैं आपके खुदा को नहीं जानती, और ऐसे खुदा को नहीं मानती जो इन्सानो की हत्या करने पर जन्नत देता हो। इसलिए मैं अपने खुदा से दुआ करूँगी, आपके खुदा से नहीं।"

Sunday, 14 June 2015

माँ (A short story in Hindi)

आज मेरे कलकत्ता प्रवास का आख़िरी दिन था। कल फिर ट्रेन पकड़ कर वापस मुंबई आना था और समान बांधने की तैयारी की जा रही थी। इस बार की छुट्टियों में और कुछ हुआ हो या नहीं, मुझे यह पता चल गया था कि मुझे शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों है। अब दवाइयाँ शुरू हो चुकी थी और उम्र भर चलनी थी। माँ पिछले 3 घंटों से गायब थी। मैंने माना किया था कि इतनी दोपहर में कही जाने की जरूरत नहीं है। मैं मुंबई जा रहा था, वहाँ हर वह चीज़ मिलती है जो कलकत्ता में मिलती है। मैंने माँ को साफ़ कह दिया था की मैं समान नहीं बढ़ाऊँगा। फिर भी माँ कही बाहर निकाल गई थी। वह जानती थी कि यदि मुझे पता चला तो मैं जाने नहीं दूँगा, इसलिए चुप चाप बिना बताए चली गयी थी। इसी चक्कर में अपना मोबाइल भी नहीं ले गई थी। घर में सभी परेशान थे। मैं चिल्ला रहा था कि जो भी वो लाएगी बेकार जाएगा क्योंकि मैं कुछ भी ले जाने वाला नहीं हूँ। घर में सब मेरे गुस्से को जानते थे, इसलिए समझाने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि माँ आख़िर माँ होती है, बस उस पर चिल्लाना मत। समान नहीं ले जाना है, मत ले जाओ, पर चिल्ला चिल्ली मत करना। 

जब माँ आई तो मेरा गुस्सा उसका गर्मी से क्लांत चेहरा देख कर और बढ़ गया। बाहर 40 डिग्री गर्मी में इस उम्र में उसे क्या जरूरत थी बाहर जाने की। दरअसल मेरा गुस्सा मेरी मजबूरी की वजह से था कि ना तो मैं उसे रोक सका था और ना ही मोबाइल पर फ़ोन कर वापस बुला सका था। 

इससे पहले मैं उसपर चिल्ला पाता, उसने मेरे सामने एक डिब्बा रखते हुए कहा, “यह लो शुगर फ्री रसगुल्ला।“ 
मेरे अंदर एक बिजली सी दौड़ गई। माँ ने इस बार मुझे मिठाई नहीं खिलाई थी, शुगर की वजह से। वह इस गर्मी में मेरे लिए बिना शक्कर वाली मिठाई लेने गई थी। बहुत मुश्किल से मैंने अपनी आँखों को बहने से रोका। मुझे कुछ ना कहते या करते देखकर माँ ने अपने हाथों से एक रसगुल्ला मेरे मुंह में दाल दिया। थोड़ी देर पहले इतना चिल्लाने वाला मैं, कुछ भी बिना कहे रसगुल्ला खाने लगा।

विनय पाण्डेय
१४ जून २०१५ 

Monday, 27 April 2015

Pray for Nepal and Don't play politics over tragedy



 We just had a tragedy in Nepal and some part of India. Thousands of people lost their life and thousands more were injured. There is loss of property worth millions. It really a sad situation and we should pray for those who suffered in recent earthquake. But it’s more saddening that some people are actually trying to take advantage of this tragedy!! When I see post about praising some institute or person, on what they have done for victims, along with some bad language used for specifically targeted religion or groups or people asking what they are doing, it negate on whatever good these institutions or people are doing. If you are doing some good work just to show others and make fun of them, it cannot be called good work. Below is one such example. I praise our Army for reaching out to victims in record time for rescue. Our government is also responsible for this quick action, and they should be praised too, including our PM. But that does not mean some cheap people start posting filthy language about some community for not doing anything, even when they do not know if the community or organization or people in question have done something or not. It is just the culture of hate politics. I feel bad because a lot of ignorant people blindly believe such posts and share it. 

Here, in this post, RSS has not sent anyone to Nepal, and they have issued official clarification about it. There is no confirmation about what Shiv Sena is doing or planning to do. Similarly, there are posts going on about Swarn Mandir and Delhi Gurdwara sending thousands of food packets to Nepal. That news is true, as they are going to send food packets. But it actually presented again in negative way, questioning others on what they are doing. I am sure no one from Gurdwara or Swarn Mandir wants any publicity for what they are doing. They are doing this to help the victims of this tragedy. We all should be doing our bit to help these people. I am going to donate for relief work, but I will not be posting any such message to question others where they are and what are they doing. I think such posts are similar to what we call in Hindi लाशों पर रोटी सेकना। Please see this pic taken from one such post, and decide for yourself. 

All I would request you to pray for the victims, do whatever you can to help them. If you are not able to physically go there, at least help some of the charities who are trying to help the victims. Below are some of the charities which are authentic and you can donate to these for help. 






Please note that the Prime Minister's National Relief Fund is of India's, but we all know that our government and army is helping with full effort to the victims. I am donating to them, as I can see the help they are providing. But the other charities are also vetted and authentic. So, go ahead, please donate whatever you can. Someone will thank you for your help. And please please please, stay away from hate posts by people who are looking for an opportunity in this tragedy as well.

Tuesday, 14 April 2015

Net Neutrality or अंतर्जाल (नेट) निष्पक्षता


आप लोगो ने यह शब्द कई जगह पढ़ा या सुना होगा। आजकल भारत में यह शब्द सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। अर्थात ट्रेडिंग कर रहा है। लोग इसके बारे में फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट कर रहे है। हमारी ट्राई ने भी अपने वेब साइट पर लोगो से सलाह माँगी है। अँग्रेज़ी में बहुत लेख मिल जाएँगे इसके बारे में। सोचा क्यों न हिंदी पढ़ने वाले लोगो के लिए साधारण भाषा में इसकी व्याख्या कर दी जाये। शायद यह जानकारी आपके लिए उपयोगी हो। 

नेट निष्पक्षता क्या है?


नेट निष्पक्षता का अर्थ है, एक मुक्त इंटरनेट, जिसके किसी भी हिस्से को देखने/पढ़ने/सुनने के लिए सिर्फ़ एक प्रकार के साधन की आवश्यकता हो। अर्थात डाटा, किसी भी प्रकार का डाटा, समान माना जाये, और उसमें इसलिए कोई भेद ना किया जाये की वह कमेंट है, या वीडियो है या फोटो है। साधारण शब्दों में, आज आप अपने घर पर इंटरनेट लेते है, या फिर अपने मोबाइल फ़ोन पर इंटरनेट लेते है। आप उसके लिए पैसे देते है। घर पर ब्रॉडबैंड के अलग अलग डाटा रफ़्तार यानि स्पीड के पैकेज है, आप शायद वाई फाई भी लगा ले। वैसे ही मोबाइल पर भी कई पैकेज है, 2जी 3जी या फिर जल्द ही आने वाला एलटीई 4जी। एक बार हमने पैकेज ले लिया, उसके पश्चात हम उस इंटरनेट पर क्या करते है, उससे हमारे सर्विस प्रोवाइडर को कोई मतलब नहीं होता। हम चाहे तो यू ट्यूब पर वीडियो देखे, गाने सुने, व्हाट्स एप्प या फेसबुक पर दोस्तों से बातचीत करे। वीडियो चाट या फिर स्काइप पर VOIP वाले कॉल करे। हमारे फ़ोन वाले या ब्रॉडबैंड वाले हमें सिर्फ़ इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए पैसे लेते है। यह है आज की परिस्थिति। और यही है नेट निष्पक्षता। 

Sunday, 12 April 2015

पच्चीस वर्ष बाद (Hindi Story)

आज सुबह की डाक से मिले पत्र ने मुझे चौंका दिया। पुरानी यादें ताज़ा हो गई।  मानस पटल पर चल-चित्र कि भाँति मेरे नागपुर में गुज़ारे दिन सामने आने लगे। 

पच्चीस वर्ष पूर्व की वह सुबह जब चलती ट्रेन में मेरी उससे मुलाकात हुई। मेरी नई नई नौकरी लगी थी, और मैं कंपनी के काम से कुछ दिनों के लिए नागपुर जा रहा था। वह ट्रेन में बिलासपुर से नागपुर जाने के लिए चढ़ी थी। अचानक की हम दोनो में बातों का सिलसिला चल पड़ा और नागपुर तक का रास्ता बात करते करते ही कटा। हम नागपुर स्टेशन पर एक दूसरे का सामान लेकर इस तरह उतरे जैसे दोनो साथ साथ आए हो। मैं नागपुर पहली बार आया था, वह नागपुर में पढ़ती थी और उसे अपने होस्टल जाना था। उसने मुझे एक होटल तक पहुँचाया और अपने होस्टल चली गयी। जाते वक़्त फिर मिलने का आश्वासन था। मुझे आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हो रही थी। अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं कर पा रहा था। 

Sunday, 5 April 2015

Mandatory registration of IMEI numbers

I came across information related with mobile rule in Turkey. All IMEI numbers of locally sold mobile phones are registered at service providers’ network. Any foreign phone, with non-registered IMEI number can work without any issue, if it is using its original foreign network SIM card. That would come under international roaming and user will have to pay stiff charges as per international roaming rates. But if someone visiting the country with foreign phone and try to use the local SIM card, it will be blocked within days as that would be categorized as non-registered IMEI number. So, you have 3 options for mobile phone use in Turkey:
  1. You can use a foreign phone and SIM card, and pay international roaming charges for all your calls. 
  2. You can buy a phone at local store, along with a local SIM card. There are places in Turkey where you can get phones on rent as well. This option is like anyone using a local phone. 
  3. You have to register your phone (basically its IMEI number) with authorities. This is a complicated process, as it requires a valid foreign passport and invoice of the phone to prove your ownership. Once registered, you can buy and use a local SIM card in that phone. 

Why am I telling you all this about Phone rules in Turkey? This is a simple piece of information passed on to me, and it kept me thinking. Why can’t we implement this here in India? 

Friday, 3 April 2015

How can we educate India?

India has very low literacy rate, and that is responsible for most of our social issues. With explosion of population, we have millions of uneducated people who can easily be manipulated. This is the reason we still see racial or religious issues taking front row in any election. Most of the people vote for caste and religion rather that candidate’s ability or development agenda. It’s not that they don’t want to, but due to lack of education or proper education, they just can’t judge the candidates based on merit. Similarly, honor killing, rape, dowry and all such social evils are also indirectly related to our education system. If you educate people from their childhood, and provide proper guidance abut such social evils, you should be able to minimize such problems, if not eradicate it. 

Our budget allocates less than 4% to Education sector. This is very less money to even take care of primary education in our vast country. Then we already have so many grants going out to the existing institutions from this money, reducing it further. We do need more money to be allocated to Education Sector, but till this is not happening, we have to get things done in this limited budget. 

Private sector schools are only targeting Tier A and B cities. They are not yet going to smaller towns. Villages are completely ruled out in their expansion map. Even in major cities, we still have less number of schools than it is required. 

So, we have a major problem in hand, and our government does not have enough resources to take care of this problem. What should we do?