Sunday, November 23, 2014

एक पेड़ की चाह



मैं एक पेड़ हूँ। एक सुखा हुआ पेड़। आज अपनी आख़िरी घड़ियाँ गिनता हुआ इंतज़ार कर रहा हूँ आपने आख़िरी कर्तव्य के लिए। पहले शायद कुछ रहे हो, पर अब मेरे कुछ अरमान नहीं है। परंतु जब तलक जान बाकी है, कही ना कहीं कोई जिज्ञासा या लालसा घेर ही लेती है। आज भी मेरे मन में बार बार ये विचार आता हैं, की शायद अब मेरे जीवन में सिर्फ़ कट कर अग्नि के हवाले होना बाकी है। अग्नि प्रवेश कहाँ होगा! क्या मैं किसी गरीब के घर चूल्हे में जलकर उसके परिवार को भोजन देने का माध्यम बनूँगा? या किसी निर्दयी शिकारी के शिकार को पकाने के लिए जलूँगा। शायद गरीब मजदूरो के अलाव में जलकर उन्हें कड़ाके की ठंड से बचाऊँगा, या शायद किसी धनाढ्य के घर पर आतिशदान में जलते जलते उनकी एक दूसरे के प्रति हृदय में ईष्या रखते हुए मित्रता का ढोंग देखूँगा। शायद किसी के जीवन की अंतिम यात्रा का माध्यम बनते हुए चिता में जलूँगा या एक नए युग की शुरुआत की क्रांति के प्रतिक के रूप में मशाल बनकर जलूँगा।

Interstellar – The story behind the story!

I have to admit, when I came out of this movie, I was confused, and thinking hard to find a logical sense to the story. One thought which came to my mind was that my thinking ability is of 3 dimensions and that’s the reason I am not able to logically conclude this 5 dimension story. But few hours later, and few brainstorming sessions with myself, I came up with a somewhat logical explanation on what could have happened in the background, not shown to us, but may have leads to this story-line. 

Here, in this story behind the story of Interstellar, I am presenting the story which may have happened in the normal timeline, without the event shown in the movie. These timelines will lead to a situation where the movie would have started. Read on, to check what has happened in the actual timeline. 

Saturday, November 8, 2014

कर्मठता (A short story in Hindi)

"रामलाल, मैं पिछले तीन दिनों से देख रहा हूँ, तुम बारिश में भी आकर गाड़ियाँ धोते पोंछते हो। बारिश में गाड़ी पोंछी या नहीं, किसने देखा है?"

"बाबू साहब, ये मेरा काम है। अगर बहाने ही बनाने है तो बारिश क्या और धूप क्या। कोई और देखे या ना देखे, मेरी अंतरात्मा देख रही होगी, मेरा ईश्वर देख रहा होगा। ऐसे में मैं अपने काम में कोताही कैसे बरत सकता हु?"

रामलाल की कर्मठता ने मुझे झकझोर के रख दिया जिसने अभी अभी ऑफिस फ़ोन करके बारिश के बहाने से आज की छुट्टी की थी।

विनय कुमार पाण्डेय
13 July 2014


Wednesday, October 15, 2014

चुनाव (Election - a short story in hindi)

आज चुनाव का दिन है। पिछले कुछ हफ़्तों से कान पक गए है चुनाव प्रचार सुन सुन कर। ढेरों पार्टियाँ और उतने ही ढेर सारी उनके वादे। ऐसा लगता है मानो सभी संकल्प लिए है देश में राम राज्य लाने के लिए। सब अपने को एक दूसरे से अच्छा साबित करने पर तुले है। इस प्रक्रिया में और कुछ हो ना हो, एक दूसरे की पोल जरूर खोल रहे हैं।

मुझे आज काम पर भी जाना है। भले ही मैनेजर ने आज वोट देने के लिए थोड़ा देर से आने की अनुमति दे दी है, परंतु मैं भली भाँति जानता हूँ की देर से जाने पर शाम को देर तक बैठना ही पड़ेगा। मुझे वोट देने का कोई शौक नहीं है। परंतु पिछले कुछ दिनों से हमारे मुहल्ले के नौजवानों ने एक मुहिम चलाई थी, जिसके जरिए वो वोट देने के लिए लोगों को समझा रहे थे। पहले तो लगा की ये किसी पार्टी के लिए प्रचार कर रहे है। आखिरकार आदत नहीं रही किसी को निःस्वार्थ कुछ करते देखने की। परंतु जब उनकी बातें सुनी और आग्रह कर कर के बैठने पर मजबूर करने के बाद उनका नुक्कड़ नाटक भी देखा तो एहसास हुआ की चुनाव में हिस्सा ना लेकर गलती करूँगा। उन नौजवानों को मैंने मन ही मन धन्यवाद किया और जैसा की उन्होंने समझाया था, किसी पार्टी को वोट ना देकर अच्छे उम्मीदवार को वोट देने का निश्चय किया।

फिर अपने इलाके के उम्मीदवारों के बारे में पूरी जानकारी निकाली। बहुत सोचने के बाद एक उम्मीदवार पसंद आया। अख़बारों के अनुसार इस बार काँटे की टक्कर थी उस उम्मीदवार की एक बड़ी पार्टी के उम्मीदवार के साथ। बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप थे, परंतु यहाँ की जनता में जातिवाद के चलते उसके जीतने की पूरी संभावना थी। परंतु जिस उम्मीदवार को मैंने पसंद किया था, वो भी कुछ कम नहीं था। उनकी ईमानदारी और साफ़गोई की वजह से लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे। पेशे से एक शिक्षक होने की वजह से उनकी इज्ज़त भी बहुत थी। अब देखना यह था की ईमानदारी जीतती है या जातिवाद।

Tuesday, September 9, 2014

अमृत विष (Short story in Hindi)

होठों से गिलास लगा कर पीते वक़्त उसकी आँखों में वो सभी दृश्य एक चलचित्र की भाँति गुजर गए, जिनकी वजह से आज वो इस स्थिति में पहुँचा था।
"तो क्या आफत आ गयी अगर तुमने मुझे किसी के साथ बिस्तर पर देख लिया? कभी अपने गिरेबान में भी झाँक कर देखो और कहो की तुमने कभी मुझे धोका नहीं दिया?"
"भइया अब मैं क्या कहु, आप चाहे तो मैं कुछ पैसे आपको दे सकता हूँ, पर आपने ख़ुद बिना देखे हस्ताक्षर किया है तो मुझे दोष क्यों दे रहे है?"
गिलास खाली हो चूका था और साथ में आँखों के आगे चलता चलचित्र भी रुक गया था। अब आँखे भारी हो रही थी, जिस्म भी शिथिल पड़ रहा था, परंतु उसकी आँखों में एक सुकून था। “अब मैं किसी को शिकायत का मौका नहीं दूँगा।”

विनय कुमार पाण्डेय
१७ मार्च २०१४


Tuesday, August 5, 2014

मुझे मांफ कर देना (a very short story in hindi - Mujhe Maaf Kar Dena)

"मुझे माफ़ कर देना", ये सुनते ही मानो मेरे अंदर एक करंट सा दौड़ गया। सारे मतभेदों के बावजूद, अपने पिता को ख़ुद से माफ़ी माँगते देख मानो मुझ पर घड़ों पानी पड़ गया हो।
“आप ऐसा क्यों कह रहे है पापा, आप क्यों माफ़ी माँगेंगे? सारी गलती मेरी है और आप माफ़ी मांग रहे है?” मैं सिर्फ़ इतना ही कह पाया।
उस क्षण ये अहसास हुआ की मेरे अंदर अपने पिता के लिए कितना प्रेम एवं सम्मान भरा था। मतभेदों की वजह से वो कुछ दब सा गया था। पर आज सारे बांध टूट गए थे। पिता के एक वाक्य ने मुझे अंदर तक झकझोर कर वो दबा हुआ प्रेम और सम्मान बाहर निकाल दिया था।
अब और अनादर नहीं कर सकता मैं अपने पिता की। बस यही एक बात रह गयी थी मेरे दिलो दिमाग में। अब कोई मतभेद या दुराव भरी बात याद ना रही। जी चाहा की उनके पैरों पर गिरकर माफ़ी मांग लू। पर सिर्फ़ रोते हुए उनके गले ही लग पाया।
दोनों की आँखों से बहते आंसू हमारे मतभेदों को जाने कहा बहा ले गए।

- विनय कुमार पाण्डेय 26 मार्च 2014
Binay Kumar Pandey 26 March 2014

Tuesday, June 10, 2014

भय (Fear - a short story)

"क्या ये संभव है? मुझे तो यह संभव ही नहीं लगता है|" मैंने कह तो दिया, पर मुझे स्वयं अपनी आवाज़ खोखली लगी| मानो मैं स्वयं को बहलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था| पर क्या करता| मुझे किसी भी हालत में पैसों का इंतजाम होता नहीं दिख रहा था| डॉक्टर ने साफ़ साफ़ कह दिया था की बिना पैसों के वो कुछ नहीं कर सकता| आज जब एक उम्मीद की किरण दिखायी दी भी तो उसमें खतरा बहुत था| उसके कितना भी कहने पर भी मुझे ये काम संभव नहीं लग रहा थ| मैं जानता था की भले ही यह काम संभव ना लगे, मेरे पास इसमें शामिल होने के अलावा कोई चारा नहीं था| जब मेरे प्रश्न की कोई प्रतिक्रिया ना हुई, तो मुझे हाँ करनी पड़ी|

दस दिनों के बाद मुझे जेल में ख़बर लगी की इलाज ना होने की वजह से वो चल बसी| अब मेरी आँखों के सामने छाया अँधेरा छंट चुका था| मैंने लगभग संतोष की साँस ली| अब मुझे जेल या फाँसी की सजा का कोई भय नहीं था| मैं हंस पड़ा| दस दिनों पहले उसके इलाज ना होने के जिस भय ने मुझे जेल में डाला था, आज उस भय से छुटकारा मिल गया था| आज जेल में होते हुए भी मैं अपने को आज़ाद समझ रहा था|

- विनय कुमार पाण्डेय
1 अप्रैल 2014