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Showing posts from March, 2014

मुझे होली अच्छी लगती हैं (Hindi Story by me)

मुझे होली अच्छी लगती है। आज होलिका दहन है। मुझे तो ये भी नहीं पता की होलिका दहन क्या होता है। बस मुंबई की एक सोसाइटी से दूसरी सोसाइटी घूम घूम कर प्रसाद से पेट भरने में लगा हूँ। लोगो को कहते हुए सुना की ये जो आग लगा कर उसकी पूजा करते है, उसे होलिका दहन कहते है। अधिकतर लोग तो आजकल शायद अँग्रेज़ी में ही आपस में बातें करते है, इसलिए कुछ समझ नहीं आता। परंतु अभी भी कुछ लोग है, जो शायद पूरी तरह से अँग्रेज़ी ना बोल पाने की वजह से हिंदी में बातें करते है। वो लोग भी बीच बीच में कुछ शब्द अँग्रेज़ी के जोड़ ही देते है। उनकी आधी अधूरी बातों से मुझे होलिका दहन के बारे में पता चला। नहीं तो मुझ जैसे बस्ती में पैदा हुए और 10 वर्षों से वहाँ की गलियों में कभी खेलते कभी छोटा मोटा काम करते और कभी भीख माँगते गुजरी ज़िंदगी में ऐसी बातों का पता चलना मुश्किल होता है। कभी स्कूल नहीं गया, इसलिए सीखी है तो सिर्फ़ तरह तरह की गालियाँ। जबसे होश सम्हाला है, हर किसी को बिना वजह मेरी माँ बहन से रिश्ता जोड़ते हुए सुना है। लोगो के मुंह से अपना नाम कम सुना है, माँ बहन वाले अलंकार अधिक।

मैं भी कहा अतीत में भटक गया। जैसा क…

भोर का तारा - कविता (Bhor Ka Tara, a poem)

भोर का तारा, प्रतिक है समाप्त होती रात्रि का।
आने वाली सुबह का, नए दिन की शुरुआत का।
जो लगभग समाप्त हो गया, उस अँधियारे युग का।
एक आशा भरी नयी शुरुआत, नए प्रारंभ का।
जीवन के आकाश पर जल्द ही बिखरने वाली नयी उम्मीदों का।

दुविधा (Hindi Story)

आज फिर से उसी दुविधा में खड़ा था मैं। ना जाने क्यों, ऐसा लगता था कि समय फिर से लौट आया है।  अगर मैं अपने बच्चो कि बात मान लेता तो ये उसके साथ किया हुआ मेरा दूसरा अन्याय होता। एक बार ऐसे ही अपने परिवार कि खातिर मैं उसके अरमानो कि बलि चढ़ा चुका था। पर फिर से उसे दोहराने कि मेरी कोई मंशा नहीं थी। आज फिर से वही प्रश्न खड़ा हुआ था।  परिवार कि मान मर्यादा, समाज का भय, बच्चो कि इज्जत कि चिंता, लोगो के ताने कसने का भय इत्यादि। पर मन अपने एक कोने से बार बार आवाज दे रहा था। "कब तक? कब तक इन खोखली बातो के प्रपंच में आकर तुम अपने ह्रदय कि नहीं सुनोगे? भाग्य ने एक और मौका दिया है अपनी पिछली भूल सुधरने का, क्या इस मौके को भी यु हीं गवा दोगे?"

जिस प्रश्न का ऊत्तर मेरे पास आज से 35 वर्ष पूर्व नहीं था, आज कैसे होता? तब माता पिता का दबाव था, आज अपने ही बच्चो का। मेरे कानो में उनकी कही बाते गूंजने लगी।