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चीर हरण

“सखी, आज इतनी उदास क्यों बैठी हो?” कृष्ण ने द्रोपदी के समीप बैठते हुए प्रश्न किया।  “सखा, आप सर्वत्र ज्ञाता है, फिर भी क्यों पूछते है?”, दुखित स्वर में द्रोपदी ने उत्तर दिया। कृष्ण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने अपने दोनों हाथों से द्रोपदी के चेहरे हो थामा और स्नेह पूर्वक कहा, “यदि बात करोगी तो शायद मन हल्का हो जाए, इसलिए पूछा है।” “आपको नहीं लगता की मृत्युलोक में आज भी औरतों को अपना सम्मान नहीं मिला है? आज भी उन्हें प्रताड़ित एवं अपमानित किया जाता है। पुरुष वर्ग आज भी या तो दुशाशन बनकर चीर हरण करता है, या फिर भीष्म पितामह की तरह चुप चाप देखता रहता है। मेरी रक्षा को तो आप आ गए थे, पर अब इन्हें कोई क्यों नहीं बचाता? क्या इनकी रक्षा आपका दायित्व नहीं है? क्या इतिहास में कृष्ण सिर्फ एक द्रोपदी की लाज बचाने के लिए याद किए जाएंगे? जबकि आज हजारों लाखों द्रोपदीयां अपनी लाज बचाने की नाकाम कोशिश कर रही है। हर दिन सकड़ों द्रोपदी चीर हरण का शिकार होती है। क्या जगत नारायण श्री कृष्ण का उनके प्रति कोई दायित्व नहीं है? क्या उनकी नियति में चीर हरण ही लिखा है?”, कहते कहते ...

राष्ट्र गान का सम्मान या डर?

कुछ महीनों पूर्व मैं एक बंगला फिल्म “राजकाहिनी” देखने गया था। फिल्म बहुत अच्छी थी, और अब हिन्दी में भी बन रही है। मेरी ओर से सबको हिन्दी वाली फिल्म देखने की सलाह है। पर यह पोस्ट उस फिल्म या उसकी कहानी से संबन्धित नहीं है। उस फिल्म के अंत में हमारे राष्ट्र गान “जन गण मन” का असली बंगला गीत दिखाया गया है। जन गण मन को पहले बंगला में ही लिखा गया था। सिनेमा हाल में जब यह गाना शुरू हुआ, तब किसी को इसके जन गण मन होने का एहसास नहीं था। दरअसल यह गाना “जन गण मन” से शुरू नहीं होता है। दूसरी पंक्ति आते आते लोगों को पता चलने लगा, और असल राष्ट्र गान ना होते हुए भी लोग एक एक करके खड़े होने लगे। फिल्म का अंत बहुत दुखद और चौका देने वाला है। इसलिए गीत को पहचानने में थोड़ी देर लगी, पर 3-4 पंक्तियाँ होते होते सभी खड़े हो चुके थे। मैं खुद भी खड़ा हुआ था। तब सूप्रीम कोर्ट का कानून भी नहीं था और यह असल राष्ट्र गान भी नहीं था। पर पता नहीं क्यों, अंदर से इच्छा हुई खड़े होने की, और इस गीत को सम्मान देने की। भले ही यह असल राष्ट्र गान ना सही, पर अर्थ तो वही थे। 

दंगल : एक पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों पर हो रहे अत्याचार की कहानी

दंगल एक बेहतरीन फिल्म है। पूरी कहानी कुश्ती पर आधारित होते हुए भी इमोशन और ड्रामा से भरपूर है। आमिर ने एक बार फिर बाज़ी मार ली है। शायद यह 2016 की सबसे अच्छी फिल्म साबित हो।  बस इससे आगे मैं इस फिल्म की और तारीफ नहीं कर सकता। अब जो लिख रहा हूँ, वह मेरा अपना विचार है, और उसका फिल्म के मनोरंजक और अच्छे होने से कोई सरोकार नहीं है। मुझे फिल्म की कहानी पसंद नहीं आई। लगभग सबको कहानी के बारे में पता है, इसलिए यहाँ जो मैं लिख रहा हूँ, वह कोई भेद नहीं खोलेगा। कहानी में एक लड़की की विपरीत परिस्थितियों से लड़कर विजेता बनने के सफर को दिखाने की कोशिश की गई है। पर जिस नजरिए से मैंने देखा, मुझे यह एक लड़की की अपनी सफलता से अधिक उसका बलिदान दिखा। यह कहानी स्त्री प्रधान ना होकर पुरुष प्रधान निकली। एक व्यक्ति जो खुद अपने जीवन में सफलता ना पा सका, अपनी जिद के चलते अपने दो बच्चों का बचपन और उनकी इच्छाएं उनसे छीन कर, उनके जीवन को कुर्बान कर देता है। उनकी अपनी पहचान खत्म हो जाती है। हर जगह उन्हें अपनी इच्छाओं को मारना पड़ता है। लोगों के उपहास का पात्र बनना पड़ता है। और यह सब सिर्फ इसलिए कि वह अपने पित...

500 एवं 1000 की मुद्रा का विमुद्रीकरण – हमें अब क्या करना चाहिए?

जैसा की सभी जानते है, हमारी सरकार ने 1000 एवं 500 की मुद्रा का विमुद्रीकरण कर दिया है। इस महीने की 9 तारीख से यह दोनों नोट बाज़ार में मान्य नहीं है। बहु प्रचलित मुद्रा होने की वजह से बाज़ार में रुपये की किल्लत हो गयी है एवं लोगों में अफरातफरी का माहौल है। मैं कोई अर्थशास्री नहीं हूँ, इसलिए सरकार के इस निर्णय के दूरगामी परिणामों का विश्लेषण नहीं कर सकता। परंतु आज लोगों की विवशता देख पा रहा हूँ। यह लेख सरकार के निर्णय की सराहना या विवेचना करने के लिए नहीं है, बल्कि आज की स्थिति को कैसे काबू में लाया जाये, इसके बारे में है। मुझे इतने बड़े पैमाने पर आई विपदा को सम्हालने का कोई अनुभव नहीं है, मेरे अपने विचार से आज कि स्थिति को सम्हालने के लिए जो सरकार और हमें करना चाहिए, उसे अपनी छोटी सी समझ के अनुसार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। सरकार में बहुत बड़े विशेषज्ञ बैठे है, परंतु हालत बदतर होते जा रहे है। इसलिए सोचा शायद एक अलग दृष्टिकोण कि जरूरत हो।  सरकार तुरंत इन कदमों को उठाए:

Demonetization - What should we do now?

As we know that our government has taken a decision of demonetization of Rs 500 and 1000 notes from market and people are suffering due to cash crunch. I am not an expert economist to comment on long term impact of this decision, but I can see the situation on the ground, with short term impact. This article is not about merit of this decision, but it is about managing the situation in hand. We are in a mess with this implementation, and things are getting out of control. I have tried my best to come up with what the government and public should do to cope up with situation. I am not an expert on managing such large-scale crisis, so this is not a complete formula, but my two cents only.  What government should do:

The journey towards Independence

We are celebrating our 70th Independence Day this year, which means we are Independent since last 70 years, free to follow our dreams, free from all kind of evil atrocities our country witness over centuries in past. But it actually gets me thinking. Are we really independent? Do we understand independence?  What is Independence? Do we know the real meaning of Independence? According to Cambridge Dictionary, there are two meanings: Freedom from being governed or ruled by another country.  The ability to live your life without being helped or influenced by other people.  Our country is free and not ruled or governed by any other country, so in that sense, India is independent. But, as per the second meaning, are we, the people of India, really independent? Another question raised here is about our country. India is not governed or ruled by any other country, but if we use the second meaning in context of our country, is our country really independent? Le...

समर शेष है

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध। ना जाने क्यों दिनकर जी की यह कविता आज बहुत याद आ रही हैं। शायद यह कविता अधूरी है। आज सिर्फ़ व्याध नहीं है, बल्कि व्याध के साथ खड़े लोगो का हुजूम भी है, जो उन्हें शाबाशी देता है, और दूसरों को तटस्थ रहने या फिर बहलाने का काम भी करता है। वह स्वयं कुछ नहीं करते, बस व्याघ्र का पक्ष लेकर उन्हें रक्षक घोषित करवाने में मदद करते है। वह ऐसे लोग है, जिन्हे उत्तर प्रदेश की घटना एक दुर्घटना लगती है, और साथ में मीडिया पर इस दुर्घटना को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप भी लगाते है। वह ऐसे भी लोग है जो इस आतंकवाद के लिए पीड़ित परिवार को ज़िम्मेवार ठहरा रहे है। मैं अधिक नहीं लिख पाऊँगा, क्योंकि मैं स्वयं तटस्थ वाली श्रेणी में आता हूँ। शायद मुझे आज इस सांप्रदायिकता और धर्मांधता के खिलाफ़ लड़ाई शुरू कर देनी चाहिए। पर मैं ठहरा एक साधारण इंसान, दो वक़्त की रोटी कमा कर अपने और अपने परिवार का पेट पालने वाला, यदि समर में कूद गया, तो मेरे परिवार का क्या होगा! इसी स्वार्थ की वजह से मैं यह अन्याय देखकर भी चुप रह जाता हूँ। यहा...

India’s Daughter – A mirror to our society

Today is international Women’s Day, and BBC wanted to launch their new documentary India’s Daughter today all over the world. This documentary is banned by Indian government, but still available at various platforms, and lots of people have seen it. I think the ban is not justified, as it is like banning a mirror which shows our true face. It’s more like few of those discussions we always try to avoid. This documentary brings out the topics which we don’t want to discuss. So, the better way to avoid such discussions is to ban it, and no one will talk about it.  The documentary is not offering anything new to the Indian viewer. We all more or less know these things already. To put everything into context before we discuss this, here is a summary of what is shown in the documentary.