Sunday, 25 December 2016

दंगल : एक पुरुष प्रधान समाज में लड़कियों पर हो रहे अत्याचार की कहानी

दंगल एक बेहतरीन फिल्म है। पूरी कहानी कुश्ती पर आधारित होते हुए भी इमोशन और ड्रामा से भरपूर है। आमिर ने एक बार फिर बाज़ी मार ली है। शायद यह 2016 की सबसे अच्छी फिल्म साबित हो। 

बस इससे आगे मैं इस फिल्म की और तारीफ नहीं कर सकता। अब जो लिख रहा हूँ, वह मेरा अपना विचार है, और उसका फिल्म के मनोरंजक और अच्छे होने से कोई सरोकार नहीं है। मुझे फिल्म की कहानी पसंद नहीं आई। लगभग सबको कहानी के बारे में पता है, इसलिए यहाँ जो मैं लिख रहा हूँ, वह कोई भेद नहीं खोलेगा। कहानी में एक लड़की की विपरीत परिस्थितियों से लड़कर विजेता बनने के सफर को दिखाने की कोशिश की गई है। पर जिस नजरिए से मैंने देखा, मुझे यह एक लड़की की अपनी सफलता से अधिक उसका बलिदान दिखा। यह कहानी स्त्री प्रधान ना होकर पुरुष प्रधान निकली। एक व्यक्ति जो खुद अपने जीवन में सफलता ना पा सका, अपनी जिद के चलते अपने दो बच्चों का बचपन और उनकी इच्छाएं उनसे छीन कर, उनके जीवन को कुर्बान कर देता है। उनकी अपनी पहचान खत्म हो जाती है। हर जगह उन्हें अपनी इच्छाओं को मारना पड़ता है। लोगों के उपहास का पात्र बनना पड़ता है। और यह सब सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता कि जिद के आगे जबान नहीं खोल सकती। एक पुरुष प्रधान समाज का बहुत ही घिनौना रूप दर्शाया गया है इस फिल्म में। पहले वह लड़के कि आस में चार लड़कियां पैदा करता है। फिर दो लड़कियों के बाल काट कर उनका बचपन उनसे छीन कर, उन्हें पहलवान बनने के लिए मजबूर करता है। लड़कियां ना तो अपने पसंद का खाना खा सकती है, ना खेल सकती है, ना सहेलियों की शादी में जा सकती है, न ही नाच गा कर खुशियाँ मना सकती है और ना ही कोई शृंगार कर सकती है। उन्होने अपना पूरा जीवन अपने पिता की अधूरी इच्छा पर न्योछावर कर दिया। 


शायद मेरे सोचने के तरीके में ही कुछ समस्या है। मेरे परिवार वालों ने भी मुझसे कहा कि मैं बहुत नकारात्मक सोचता हूँ इसलिए मुझे यह कहानी पसंद नहीं आई। उन्हें इस कहानी में कोई कमी नहीं दिखाई दी। उनके अनुसार इस पिता ने अपनी लड़कियों का जीवन सफल बना दिया। इस बात ने मुझे और सोचने पर मजबूर कर दिया। हमारा समाज इस कदर पुरुष प्रधान है, कि यदि कोई बाप इस तरीके से अपनी बेटी के पूरे जीवन की कुर्बानी लेता है, तो भी हमारा समाज उसे गलत नहीं समझता। मुझे आमिर खान का किरदार इस फिल्म का खलनायक लगा, जो ना सिर्फ अपनी अधूरी इच्छा पूरी करने के लिए अपनी लड़कियों का जीवन बर्बाद करता है, जब उसकी एक लड़की राष्ट्रीय स्तर की विजेता बनकर सरकारी प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षित होते हुए थोड़ी सी अपनी खुशी के अनुसार जीने की कोशिश करती है, तो वह उससे बुरी तरह नाराज़ होकर बात बंद कर देता है। शायद यह कोई काल्पनिक कहानी पर बनी फिल्म होती तो मैं इतना नहीं सोचता। पर यह एक सच्ची कहानी पर आधारित है, और यह एक नहीं बल्कि दो लड़कियों के बलिदान की कहानी है। यही कारण है कि मैं इस नकारात्मक सोच का शिकार हो गया हूँ। 

आप इस फिल्म को अवश्य देखे, और खुद विचार करें कि क्या मेरी सोच सही में नकारात्मक है, या फिर महावीर सिंह फुगत नमक किरदार इस फिल्म का नायक नहीं खलनायक है। कम से कम एक बात का आश्वासन अवश्य दे सकता हूँ, कि यह फिल्म आपको अवश्य पसंद आएगी। 

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