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त्रैलोक्या तारिणी

त्रैलोक्या तारिणी ✦ ऐतिहासिक साहित्यिक उपन्यास ✦ विनय कुमार पाण्डेय ‘चामुण्डा‘   समर्पण उन सभी स्त्रियों के नाम जो इस समाज की चुप्पी और अन्याय के बीच अपने हिस्से की चीख़ दबा गईं। और उन आवाज़ों के नाम, जो अब भी दीवारों के पीछे गूँजती हैं। ---   1850 के दशक के बंगाल में जन्मी एक नन्ही बालिका—त्रैलोक्या—समाज के काले कानूनों और पितृसत्ता की क्रूर परंपराओं के बीच पिसती है। विधवा बनकर बहिष्कृत, वेश्या बनकर बिकती है, और अंततः हत्यारिन बनकर इतिहास में दर्ज होती है। ‘त्रैलोक्या तारिणी’ एक ऐसी स्त्री की कालजयी कथा है जो अपने ज़ख्मों से एक युद्ध रचती है। यह उपन्यास पाठक को उस युग की गलियों में ले जाता है जहाँ हर स्त्री, या तो चुप रहती थी—या अपराधी बन जाती थी। सच्चाई, सहानुभूति और आक्रोश की एक त्रयी—जिसे पढ़ना केवल एक कहानी पढ़ना नहीं, बल्कि एक सवाल का सामना करना है। “क्या व्यवस्था भी हत्यारिन होती है?” --- प्रस्तावना: लेखक की ओर से जब मैंने पहली बार त्रैलोक्या तारिणी का नाम एक छोटे से समाचार आलेख में पढ़ा, तो वह एक अपराधिनी की तरह प्रस्तुत की गई थी—भारत की पहली महिला सीरियल किलर। ...

सिगरेट - Hindi short story

मैं एटीएम से पैसे निकाल कर अस्पताल की तरफ आ रहा था। अचानक रास्ते में एक व्यक्ति ने मुझे आवाज दी, "अंकल, अंकल" मैंने उसकी तरफ देखा, तो उसने गिड़गिड़ाती हुई आवाज में कहा, "मेरे को हफनी है, दवा के लिए 20 रुपये दे दो।" एक पल को मैं समझ नहीं पाया कि क्या कह रहा है, पर यंत्रवत मेरे मुंह से निकला, "दवा वाले से मांगो।" और मैं अपने रास्ते चल दिया। मैंने पलट कर देखा तक नहीं कि वह वही खड़ा है या आगे चला गया। चंद कदम चलने पर मेरे अंदर दबी हुई इंसानियत ने धीरे से आवाज दी, "15 रुपये की सिगरेट पीने वाला 20 रुपये दे ही सकता था। क्या पता उसे सच में जरूरत हो।" आधी सिगरेट अभी भी मेरे हाथ में जल रही थी। अपनी अंतरात्मा की उस बात से मेरे अंदर के उस व्यवहारिक इंसान को चोट पहुंची जिसने उसे पैसे देने से माना किया था। उस अंतर्द्वंद की वजह से सिगरेट अब कसैली लगने लगी थी। मेरे अंदर के व्यवहार कुशल चालाक व्यक्तित्व ने मेरी इंसानियत एवं अंतरात्मा से कहा, "बात 20 रुपये की नहीं, व्यवहार और समझदारी की थी। मुझे नहीं पता वह आदमी कौन था। मेरे पर्स में 40 हजार रुपए थे अस्...

मुआवजा (Compensation) - A short story

“आर्डर आर्डर”, कहते हुए जज ने चिड़िया से पूछा, “तुम्हारा वकील कौन है?”  “जी माई बाप, वकील करने की मेरी हैसियत नहीं है। इसलिए मैं खुद ही अपनी फरियाद रखना चाहती हूँ।“  “तुम चाहो तो कोर्ट तुम्हें एक वकील दे सकता है।“ “नहीं जज साहब, मुझे ऐसे वकील पर भरोसा नहीं होगा जो बिना किसी स्वार्थ के मेरे लिए मुकदमा लड़ेगा। ऐसा वकील ने यदि दूसरी तरफ से पैसे लेकर केस कमजोर कर दिया, तो मैं कहीं की नहीं रहूँगी।“ चिड़िया ने दृढ़ स्वर में कहा।  “तुम्हारे इस बेतुके इल्जाम पर मैं तुम्हें कोर्ट की अवमानना करने की सज़ा दे सकता हूँ, इसलिए मेरी कोर्ट में ऐसे बेहूदा इल्जाम लगाने से पहले सोच लेना। इसे अपनी पहली और आखिरी चेतावनी समझो।“ जज ने झल्लाए हुए शब्दों में कहा। शायद उसे चिड़िया की बात चुभ गई थी।  “जज साहब, जिस फरियाद को लेकर मैं यहाँ आई हूँ, वह सरकारी कर्मचारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार की वजह से हुआ है। इसलिए आप जिसे कोर्ट की अवमानना समझ रहे है, वह मेरे लिए सरकारी तंत्र पर अविश्वास है। यदि आप भी न्याय की जगह मुझे सज़ा देना चाहते है, तो दे दीजिए, पर मेरा अविश्वास फिर भ...

ठग महात्मा - Hindi short story

वह एक बहुत शातिर ठग था। अपनी ठगी से उसने बहुत घन-संपत्ति इकट्ठा कर ली थी। परंतु आखिरी ठगी के बिगड़ जाने की वजह से उसे अपना शहर छोड़ कर भागना पड़ा। वह एक दूसरे शहर में बिना पैसे और रहने की जगह के, मारा मारा फिर रहा था। एक दिन उसने एक सेठ को ग़रीबों में खाना बांटते हुए देखा। उसका ठगी वाला दिमाग फिर सक्रिय हो चला, और वह उन ग़रीबों से हटकर एक तरफ निर्लिप्त होकर बैठ गया। सेठ ने पहले तो उसे नज़रअंदाज़ किया, फिर जब सभी ग़रीबों में बांटने के पश्चात भी खाना बचा रह गया, तो उसके पास जाकर उसे देने की कोशिश की। मैले से एक चद्दर में अपने को लपेटे, उलझे बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी में बैठा, सेठ को खाना देते देखकर उसने कहा, “तू बहुत गरीब है। और तुझे जो चाहिए वह सिर्फ मुट्ठी भर अनाज दान करने से नहीं मिलेगा। अपने पापों का प्रायश्चित्त कर, उसी में भलाई है।” सेठ अवाक रह गया। उसे यह समझ में नहीं आ रहा था, कि इस अजीब से दिखने वाले व्यक्ति को यह कैसे पता है कि वह किसी कारण से दान कर रहा है, और उसकी कोई अतृप्त इच्छा भी है। उसे लगा कि यह कोई बहुत पहुंचे हुए महात्मा है, जो उसके भाग्य से यहाँ उसे मिल गए है। उसने हा...

ऑफलाइन

“आप अपने प्रोफ़ाइल पर अपनी फोटो क्यों नहीं लगाते है?" सुजाता अपनी सहेली की बात से डर गई थी। उसने अपनी खुद की कहानी बताई थी, कि कैसे उसे भी किसी अंजान व्यक्ति से सोशल मीडिया पर मित्रता हो गई थी, और बाद में उसने इसे ब्लैकमेल करने की कोशिश की थी। उसका घर उजड़ते उजड़ते रह गया था। उसके चाचा जी पुलिस में है, और उनकी वजह से वह उस ब्लैकमैलर के शिकंजे से बची थी।  आज तीन महीने से वह राहुल से ऑनलाइन बाते करती थी। दोनों ने एक दूसरे की तस्वीर भी नहीं देखी थी। बस मोबाइल पर लिख कर बातें होती रहती। शादी के 15 वर्ष बाद उसे कोई ऐसा मिला था जिसके साथ वह एक बार फिर दिल खोल कर बाते कर सकती थी। दोनों की पसंद एक जैसी थी, और जितना कुछ उन्होंने एक दूसरे को बताया था, उसके अनुसार दोनों की जिंदगी भी एक जैसी थी। शादी के बाद लगभग 3-4 वर्षों तक वह अपने पति मनोज के साथ बहुत खुश थी। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे, साथ घूमना फिरना, घंटों तक बाते करते रहना, एक दूसरे को अच्छे से समझना; ऐसा लगता था मानो दोनों एक दूसरे के पूरक है। पर बाद में पता नहीं किसकी नजर लग गई, मनोज धीरे धीरे अपनी नौकरी में व्यस्त...

चीर हरण

“सखी, आज इतनी उदास क्यों बैठी हो?” कृष्ण ने द्रोपदी के समीप बैठते हुए प्रश्न किया।  “सखा, आप सर्वत्र ज्ञाता है, फिर भी क्यों पूछते है?”, दुखित स्वर में द्रोपदी ने उत्तर दिया। कृष्ण के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गई। उन्होंने अपने दोनों हाथों से द्रोपदी के चेहरे हो थामा और स्नेह पूर्वक कहा, “यदि बात करोगी तो शायद मन हल्का हो जाए, इसलिए पूछा है।” “आपको नहीं लगता की मृत्युलोक में आज भी औरतों को अपना सम्मान नहीं मिला है? आज भी उन्हें प्रताड़ित एवं अपमानित किया जाता है। पुरुष वर्ग आज भी या तो दुशाशन बनकर चीर हरण करता है, या फिर भीष्म पितामह की तरह चुप चाप देखता रहता है। मेरी रक्षा को तो आप आ गए थे, पर अब इन्हें कोई क्यों नहीं बचाता? क्या इनकी रक्षा आपका दायित्व नहीं है? क्या इतिहास में कृष्ण सिर्फ एक द्रोपदी की लाज बचाने के लिए याद किए जाएंगे? जबकि आज हजारों लाखों द्रोपदीयां अपनी लाज बचाने की नाकाम कोशिश कर रही है। हर दिन सकड़ों द्रोपदी चीर हरण का शिकार होती है। क्या जगत नारायण श्री कृष्ण का उनके प्रति कोई दायित्व नहीं है? क्या उनकी नियति में चीर हरण ही लिखा है?”, कहते कहते ...

अंतर्द्वंद

“मैं जा रही हूँ”, कहते हुए उसने उठने का उपक्रम किया। मैंने हिम्मत करके उसकी कलाई पकड़ ली। हमारे 2 वर्ष पुराने रिश्ते में मैंने पहली बार उसकी कलाई पकड़ी थी। वह एकबारगी चौक गई, और जल्दी से अपना हाथ छुड़ा लिया। “क्या करते हो? कोई देख लेगा तो?”, उसकी आवाज़ में स्पष्ट कंपन था।  “मुझे किसी की परवाह नहीं है। मैं तुम्हें इस तरह जाने नहीं दूंगा। चलो मेरे साथ कलकत्ता चलो।“ मैंने भी अपनी कांपती आवाज़ में कहा। ऊपर से मैं बहुत हिम्मत दिखा रहा था, परंतु अंदर ही अंदर एक द्वंद्व चल रहा था। कहा ले जाऊंगा? कैसे रखूँगा? मेरी तो अभी नौकरी भी नहीं लगी है। रहने को अपना घर भी नहीं है, गाव के कुछ लोगों के साथ बासा में रहने वाला उसे कहाँ रखूँगा। 

तरक्की - Short story in hindi

“क्या? तुम अपने कंप्यूटर पर कमांड लिख कर उसका प्रयोग करते हो? कौन से युग से हो भाई?” उपहास करते हुए समय यात्री ने कंप्यूटर पर बैठे वैज्ञानिक से कहा। “अपनी बात करो, तुम भी आदि काल के लगते हो जो ये माउस चला कर काम कर रहे हो” दूसरे समय यात्री ने पहले का मज़ाक उड़ाया। “पहले अपने आप को तो देख लो, उँगलियों से अपने इस छोटे से कंप्यूटर का उपयोग करने वाले, तुम भी बहुत उन्नत नहीं हो। मुझे देखो, मैं अपने कंप्यूटर को आदेश देता हूँ और वह मेरी बात सुनकर काम करता है।“ तीसरे समय यात्री ने दूसरे का मज़ाक उड़ाया। “जरा यहाँ भी देख लो तुम लोग, मैं सिर्फ़ सोच कर अपने कंप्यूटर को आदेश दे सकता हूँ। इसलिए मेरे समक्ष तुम सभी आदिमानव हो।“ चौथे समय यात्री ने भी अपनी तरक्की की डींग हाँकी। सभी पाँचवें समय यात्री की और देखने लगे, की वह क्या कहता है। पाँचवें समय यात्री ने सबको अपनी ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखते हुए पाया तो शांति से उत्तर दिया, “मैं स्वयं कंप्यूटर हूँ, मानव जाति ने तरक्की तो बहुत की, परंतु अपने घमंड की वजह से अपनी प्रजाति को बचा नहीं पाए।“ विनय पाण्डेय 11 जनवरी 2016

सुरक्षा भुगतान (Short story in Hindi)

एक  समय की बात हैं। एक राज्य में विदेश से एक व्यापारी आया। उसने राजा से वहाँ अपना व्यापार करने की अनुमति माँगी। राजा ने अनुमति दे दी एवं कहाँ कि उनके मंत्री इस राज्य में व्यापार करने के नियम बता देंगे। व्यापारी ने मंत्री से मुलाक़ात की एवं सभी नियम समझ लिए। उन नियमों के अलावा मंत्री ने उस व्यापारी को यह भी बता दिया था कि उस राज्य में व्यापार करने पर कुछ खास किस्म के कर देने पड़ेंगे, राजकीय अनुमति हेतु कर, उत्पादक गुणवत्ता जांच में पारित होने हेतु कर एवं सरकारी महकमों की अलग अलग किस्म की जांच से सुरक्षा हेतु कर। यह सभी कर अघोषित थे एवं बिना किसी रसीद के देने पड़ते थे। विदेशी व्यापारी ने सभी शर्तें मंज़र कर अपना व्यापार “निशाले” के नाम से शुरू किया। बहुत जल्दी ही उसका व्यापार चल निकला और लोग उसके बनाए उत्पादों को पसंद करने लगे। फिर वह व्यापारी विदेश से ही अपना यहाँ का व्यापार देखने लगा। यहाँ उसने कुछ अधिकारी नियुक्त कर दिये थे, जो उसके व्यापार की देखभाल करते थे। धीरे धीरे “निशाले” के नए नए उत्पाद बाज़ार में आने लगे, और लोगो में इन उत्पादों की प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई ...

फाँसी (A short story in Hindi)

उसकी फाँसी की सज़ा तय हो चुकी थी। बीस वर्षों कि कानूनी ज़द्दोज़हद के पश्चात अब बचने की कोई उम्मीद नहीं थी। परसों उसे फाँसी होनी थी। आज उससे मिलने उसकी 21 साल की बेटी आ रही थी। आख़िरी बार वह उससे 3 साल पहले मिली थी, और आज तक उसके अपनी बेटी के कहे शब्द याद थे।  "आपने अपना रास्ता ख़ुद चुना है, और मेरे या माँ के बारे में सोचे बिना चुना है। आपका रास्ता आपको मुबारक हो। मुझे आपसे यह नहीं समझना है कि आपने 300 लोगो की जान किस वजह से ली है। मुझे नहीं लगता कि मैं आपकी वजह को समझ पाऊँगी। मुझे अपनी ज़िंदगी जीना है, और आपके नाम की वजह से मुझे हर जगह घृणा और दुत्कार का सामना करना पड़ा है। आज से मैं अपने आप को आपसे अलग कर रही हूँ। आपको जो सही लगा वह आपने किया, अब मुझे जो सही लग रहा है, वो मैं कर रही हूँ। मैंने आपसे सफ़ाई नहीं माँगी और मुझे आपको किसी तरह की सफ़ाई देने की जरूरत नहीं है। मेरा खुदा जानता है कि मैंने आपसे कितना प्यार किया है, कि मैं आपको बेगुनाह समझती रही हूँ। जब भी मुझे एक आतंकवादी के बेटी कहा जाता था, मैं आपके लिए लड़ी हूँ। पर अब और नहीं। मैं अपने खुदा से आपके लिए दुआ माँगूँग...

माँ (A short story in Hindi)

आज मेरे कलकत्ता प्रवास का आख़िरी दिन था। कल फिर ट्रेन पकड़ कर वापस मुंबई आना था और समान बांधने की तैयारी की जा रही थी। इस बार की छुट्टियों में और कुछ हुआ हो या नहीं, मुझे यह पता चल गया था कि मुझे शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों है। अब दवाइयाँ शुरू हो चुकी थी और उम्र भर चलनी थी। माँ पिछले 3 घंटों से गायब थी। मैंने माना किया था कि इतनी दोपहर में कही जाने की जरूरत नहीं है। मैं मुंबई जा रहा था, वहाँ हर वह चीज़ मिलती है जो कलकत्ता में मिलती है। मैंने माँ को साफ़ कह दिया था की मैं समान नहीं बढ़ाऊँगा। फिर भी माँ कही बाहर निकाल गई थी। वह जानती थी कि यदि मुझे पता चला तो मैं जाने नहीं दूँगा, इसलिए चुप चाप बिना बताए चली गयी थी। इसी चक्कर में अपना मोबाइल भी नहीं ले गई थी। घर में सभी परेशान थे। मैं चिल्ला रहा था कि जो भी वो लाएगी बेकार जाएगा क्योंकि मैं कुछ भी ले जाने वाला नहीं हूँ। घर में सब मेरे गुस्से को जानते थे, इसलिए समझाने की कोशिश कर रहे थे। उनका कहना था कि माँ आख़िर माँ होती है, बस उस पर चिल्लाना मत। समान नहीं ले जाना है, मत ले जाओ, पर चिल्ला चिल्ली मत करना।  जब माँ आई तो मेरा गुस्सा ...

पच्चीस वर्ष बाद (Hindi Story)

आज सुबह की डाक से मिले पत्र ने मुझे चौंका दिया। पुरानी यादें ताज़ा हो गई।  मानस पटल पर चल-चित्र कि भाँति मेरे नागपुर में गुज़ारे दिन सामने आने लगे।  पच्चीस वर्ष पूर्व की वह सुबह जब चलती ट्रेन में मेरी उससे मुलाकात हुई। मेरी नई नई नौकरी लगी थी, और मैं कंपनी के काम से कुछ दिनों के लिए नागपुर जा रहा था। वह ट्रेन में बिलासपुर से नागपुर जाने के लिए चढ़ी थी। अचानक की हम दोनो में बातों का सिलसिला चल पड़ा और नागपुर तक का रास्ता बात करते करते ही कटा। हम नागपुर स्टेशन पर एक दूसरे का सामान लेकर इस तरह उतरे जैसे दोनो साथ साथ आए हो। मैं नागपुर पहली बार आया था, वह नागपुर में पढ़ती थी और उसे अपने होस्टल जाना था। उसने मुझे एक होटल तक पहुँचाया और अपने होस्टल चली गयी। जाते वक़्त फिर मिलने का आश्वासन था। मुझे आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हो रही थी। अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं कर पा रहा था। 

जगत जननी दुर्गा मेरी माँ (A short story in Hindi)

आज पहली बार इतने सारे बच्चों को अच्छे अच्छे कपड़े पहने हुए खिलखिलाते और दौड़ते भागते हुए देख उसे आश्चर्य हो रहा था। अपने अनाथालय में बाकी के २५ बच्चों के साथ रहते हुए वह ख़ुश थी। वह भी खेलती कूदती थी उनके साथ। स्कूल भी जाती थी। परंतु यहाँ के बच्चों की ख़ुशी और उसकी ख़ुशी में बहुत अंतर था। यहाँ के बच्चों की ख़ुशी में एक अनजानी सी बेतकल्लुफ़ सी भावना थी, जैसे उन्हें किसी चीज़ की चिंता ही ना हो। बस कुछ चाहिए तो अपनी माँ के पास पहुँच कर जिद करने लगते थे। उसकी माँ तो थी नहीं, अतः यह एहसास भी एक नया सा था, की कोई ऐसा भी हो सकता है जो आपकी नाजायज़ जिद पर भी आपको प्यार से देखे और आपकी उस जिद को पूरा करे। यह नन्हें नन्हें बच्चे क्या जाने की उसके पास माँ तो ना थी, पर माँ जैसी भी कोई नहीं थी। अनाथालय में उन बच्चों की देखभाल करने वाली दीदी की उम्र भी इतनी नहीं थी की उसे वह माँ जैसी समझ पाती। वह दीदी हमेशा इस उधेड़बुन में लगी रहती थी की सभी बच्चों के पालन पोषण का इंतजाम कैसे हो। अनाथालय में ख़ुशियाँ तो थी, परंतु कल की चिंता भी छाई रहती थी उन ख़ुशियों पर। उसे भी पता था दीदी की मज़बूरियों के ...

अंतिम निर्णय (A short story in Hindi)

"उसकी आत्मा इस शरीर में कैद है। आप उसे मुक्ति दे दीजिए ताकि वो एक नया शरीर पा सके।" इन शब्दों ने रामलाल को अपने विचारों से बाहर खींचा। वो एक ऐसे प्रश्न का उत्तर ढूँढने की कोशिश कर रहे थे, जो कभी उत्तरित हुआ ही ना हो। कैसे एक पिता अपने जवान पुत्र के मृत्युनामे पर स्वीकृति दे सकता है? उनके सामने रखा था वह कागज़, जिसपर कृत्रिम श्वास नलिका हटाए जाने पर उन्हें स्वीकृति के हस्ताक्षर करने थे। हलके हवा के झोंके से वह कागज़ फड़फड़ा रहा था। मानो आत्मा शरीर से निकलने की कोशिश कर रही हो। उसी फड़फड़ाहट की आवाज़ के साथ सिनेमा के प्रोजैक्शन रूम में चली रही मशीन की तरह उनकी आँखों में चल-चित्र की भाँति चल रहा था उनके पुत्र का जीवन। बचपन की शरारत की झलकियों ने उनके चेहरे पर इस दुखद घड़ी में भी मुस्कान फेर दी। फिर जवानी की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, देर रात तक घर से बाहर और अपने साथ हुई तू तू मैं मैं याद करते करते मन में एक बार फिर मोह से प्रेरित आवाज़ उठी। "नहीं, मैं अपने बेटे को नहीं मार सकता। वो अभी ज़िंदा है। वो ठीक हो सकता है। मुझे और कोशिश करनी चाहिए।"

होली का उपहार (A short story in Hindi)

कल होली है। आज ऑफिस से निकाल कर घूमते घूमते मुख्य बाज़ार तक पहुँच गया। मैं अपने घर से दूर यहाँ एक अनजान शहर में पिछले २ सप्ताह से पड़ा हुआ था। अकेले यहाँ किसके साथ होली खेलता? घर वाले तो फिर भी होली खेल ही लेंगे। बार बार मन में एक ही खयाल आ रहा था, यदि अभी मैं घर पर होता तो शायद बच्चों के साथ बाज़ार में होता। वो अपनी पसंद के रंग और पिचकारियाँ खरीदने के लिए जिद कर रहे होते, और मैं दुकान वाले से भाव ताव करके उनके लिए रंग-पिचकारी एवं अपने लिए गुलाल ले रहा होता। आजकल पिचकारियाँ भी तो अलग अलग तरह की आ गयी है। कुछ में तो पानी के लिए अलग से डिब्बे लगे हुए है।  सोचते सोचते मेरी निगाह रंग बिरंगी पिचकारियों से सजे दुकानों से होती हुई पास खड़े कुछ बच्चों पर पड़ी, जो बड़ी ही लालसा भरी निगाहों से उन दुकानों को देख रहे थे। कुल ५ बच्चे थे, तकरीबन ६ से ८ वर्ष की उम्र के। उनकी वेश भूषा देख कर ऐसा लगता था की वह बहुत गरीब परिवार से थे, या शायद भिखारी भी हो सकते थे। तुरंत ही मैंने अपने आप को दुरुस्त किया। यदि वो भिखारी होते तो दूर से ललचाई निगाहों से निहारने की बजाय वो दुकानों से ख़रीदारी करने वालो...

होलिका दहन (A short story in Hindi)

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं। इस अवसर पर एक छोटी सी कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ, होलिका दहन, जिसमे कोशिश की है होलिका के अंतर्द्वंद्व की झलक प्रस्तुत करने की। उम्मीद है आप इसे पसंद करेंगे।  होलिका के मन में एक अंतर्द्वंद्व चल रहा था। आज उसे अपने वरदान का उपयोग करके एक बच्चे की हत्या करनी थी। और बच्चा भी कौन, उसका अपना भतीजा। बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना उसका कर्तव्य था। परंतु क्या जो वो कह रहे थे, वह सही था? क्या प्रह्लाद को अपने प्रभु की वंदना करने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए? स्वयं हिरण्यकश्यप ने भी तो ब्रह्मा की तपस्या की थी, अपने लिए अक्षय जीवन का वरदान लेने के लिए। फिर अगर प्रह्लाद विष्णु की उपासना करता है, तो इसमें गलत क्या है?  परंतु वह जानती थी कि अहंकार में  डूबे  उसके भाई को उचित अनुचित या तार्किक बात समझ में नहीं आएगी। उसे पता था कि यदि वह अपने भाई की आज्ञा का उलंघन करती है, तो उसके भाई के अहंकार को ठेस पहुँचेगी, एवं उसके क्रोध के प्रकोप से वह भी नहीं बचेगी।  होलिका ने एक निश्चय किया, उसने अपने हृदय को कठोर कर लिया था। अब उसे ...

व्यंग चित्र (A short story in hindi)

"पापा, आज भी आप ऑफिस चल दिए? आपको याद हैं ना अपना वादा?" "हाँ बेटी, अच्छे से याद है, शाम को घर आकार आपके स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए हम एक अच्छा सा चित्र बना देंगे।" "और पापा, मुझे वो आपके अख़बार वाले कार्टून जैसे चित्र नहीं चाहिए। मुझे वो अच्छे नहीं लगते हैं। पता नहीं क्यों आप ऐसे कार्टून क्यो बनाते है!" "बेटी, तुम अभी छोटी हो, जब थोड़ी बड़ी हो जाओगी तब समझ जाओगी। वो कार्टून बच्चों के लिए नहीं बड़ों के लिए होते है।" "पर बड़े लोग तो कार्टून पसंद नहीं करते! तभी तो अक्सर आपके बारे में भी बुरा भला कहते रहते है। फिर क्यों आप उनके लिए कार्टून बनाते हो?"

रेस्त्राँ (A Short Story)

बाहर बारिश हो रही थी। उस बारिश में दो बच्चे भीगते हुए नाच रहे थे। उनकी मस्ती बारिश की बूँदों के साथ इधर उधर छिटक रही थी। भीगने से बचने के लिए मैंने रेस्त्राँ के अंदर शरण ली। अंदर बैठते हुए एक चाय की मांग की। आज की घटनाओं से मेरा मन खिन्न हो चला था। उन दिनों कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा था। फिर आज का दिन तो शायद मेरे लिए बहुत ही खराब था। चाय के इंतज़ार में बैठे मेरा दिमाग अपने जीवन की परेशानियों उलझ गया।  वैसे तो अकेले बैठ कर बहुत सी अलग अलग कहानियाँ अपने आस पास देखने को मिलती है। परंतु रेस्त्राँ की उस भिड़ में भी मेरा मन कहीं और भटका हुआ था। 

गर्व

सर्दियों की वह अलसाई सुबह। ऐसा लग रहा था मानो सुबह भी देर तक सोना चाह रही हो। आकाश धीरे धीरे लाल उजाला फैलाने लगा था। मैं रात भर की अपनी नौकरी के बाद घर की ओर जा रहा था। कहने को सुबह में अलसायापन था। परंतु कुछ लोग अपने कार्यो में लग चुके थे। कही अख़बार वाले गट्ठर लेकर अपनी दुकान लगाने में जुटे थे, तो कही सफ़ाई वाले झाड़ू लेकर सड़क साफ़ कर रहे थे। मुंबई में सर्दियाँ हलकी फुलकी ही होती है। यहाँ दिल्ली वाली कड़ाके की ठंड नहीं पड़ती। फिर भी भोर में इतनी ठंड तो रहती है की आप अपने में सिमट जाए। 

तुशा – कहानियाँ भावनाओं की

आप सभी को नव वर्ष २०१५ की हार्दिक शुभकामनाएँ.  नव वर्ष के इस अवसर पर मैं अपना फेसबुक पेज तुशा आप लोगो के समक्ष रख रहा हूँ. मुझे लिखने का शौक़ हैं, परंतु कभी अपनी रचना को किसी के साथ साझा नहीं किया. गाहे बगाहे अपने ब्लॉग पर अपनी लिखी हुई कहानियाँ प्रेषित कर देता था. परंतु शायद ही किसी ने उन कहानियों को पढ़ा हो. गत वर्ष अक्टूबर के महीने में यह ख़याल आया की क्यों न फेसबुक पर एक पृष्ठ बनाया जाए, सिर्फ़ उन कहानियों के लिए. ब्लॉग पर तो कहानियों के अलावा और भी बहुत कुछ होता है. ऐसा प्रतीत हुआ की शायद मैं उन लिखे हुए शब्दों को राहत दूँगा, एक ऐसे मंच पर लाकर जहाँ बहुत से लोगो की पहुँच उन तक होगी. इससे पहले मुझे लगता था की शायद मेरा इस तरह से सभी के सामने उन कहानियों को लाना ठीक नहीं होगा. परंतु उन शब्दों में छिपे भावों को अगर मैं बंद रखता हूँ, तो यह उनके साथ अन्याय होगा. अपनी झिझक एवं शर्म को दरकिनार करते हुए यह फ़ैसला लिया गया की अब उन कहानियों को कैद में नहीं रखा जाएगा.