Monday, 10 March 2014

दुविधा (Hindi Story by me)

This is a short story written by me on Sunday 9th March 2014. Just posting it here, for the record. If anyone read it, feedback is welcome. I really wanted to change the climax, but kept it practical for a reason. If you do not agree with it, please do provide your input. Now, lets continue with the story.

आज फिर से उसी दुविधा में खड़ा था मैं। ना जाने क्यों, ऐसा लगता था कि समय फिर से लौट आया है।  अगर मैं अपने बच्चो कि बात मान लेता तो ये उसके साथ किया हुआ मेरा दूसरा अन्याय होता। एक बार ऐसे ही अपने परिवार कि खातिर मैं उसके अरमानो कि बलि चढ़ा चुका था। पर फिर से उसे दोहराने कि मेरी कोई मंशा नहीं थी। आज फिर से वही प्रश्न खड़ा हुआ था।  परिवार कि मान मर्यादा, समाज का भय, बच्चो कि इज्जत कि चिंता, लोगो के ताने कसने का भय इत्यादि। पर मन अपने एक कोने से बार बार आवाज दे रहा था। "कब तक? कब तक इन खोखली बातो के प्रपंच में आकर तुम अपने ह्रदय कि नहीं सुनोगे? भाग्य ने एक और मौका दिया है अपनी पिछली भूल सुधरने का, क्या इस मौके को भी यु हीं गवा दोगे?"

जिस प्रश्न का ऊत्तर मेरे पास आज से 35 वर्ष पूर्व नहीं था, आज कैसे होता? तब माता पिता का दबाव था, आज अपने ही बच्चो का। मेरे कानो में उनकी कही बाते गूंजने लगी। 


"इस बुढ़ापे में फिर से शादी? हमें नहीं पता था कि आपको इतनी जवानी चढ़ी है जो हम लोगो कि इज्जत का भी विचार नहीं आया।" 

"अपनी उम्र का कुछ तो लिहाज़ किया होता आपने? इस बारे में सोच भी कैसे सकते है आप?"

"कम से कम माँ का ही ख्याल कर लेते, बेचारी को मरे २ वर्ष नहीं हुआ और आप फिर से शादी कि बात कर रहे है? शर्म आनी  चाहिए आपको।"

"कौन से जन्म का बदला निकल रहे है आप हम लोगो से?"

"तीर्थ पे जाने के बारे में सोचिये, तीर्थ पे। अब आपकी ऊमर में ये शोभा नहीं देता।"

"इतना ही प्यार था तो जवानी में क्यों नहीं शादी कर ली? क्या बुढ़ापे के लिए बचा के रखा था उसे?"

"कही ऐसा तो नहीं कि आपने उसे रखैल बना के रखा था और अब शादी के लिए उसके दबाव में आ रहे है? कहे तो मैं ठिकाने लगा दू, चार पैसे मुंह पे मारूंगा, वैसे ही आपकी जिंदगी से दूर हो जायेगी।"

ये आखिरी वाक्य मेरे अंदर तक कुछ चीरता हुआ निकल गया। क्यों मुझे ये सब सुनना पड़ रहा है? क्या ये लोग इतना भी नहीं समझते कि मेरी मजबूरी क्या थी? और आज मैं अगर कुछ चाहता हु तो उसे इन लोगो को क्या फर्क पड़ता है? मैं जनता था कि ये खोखले दावे है, अपने आप को समझने के लिए। अगर ये दावे इतने ही मज़बूत होते, तो ३५ वर्ष पूर्व मैं पिछे नहीं हटता था। तब कुछ ऐसी ही मिलीजुली बाते थी, तब बच्चो कि जगह माता पिता थे। उनका सम्मान, कुल कि मर्यादा, यहाँ तक कि मेरे पिता के लिए तो यह शर्म के मारे डूब मरने वाली बात थी। अगर मैं तब उनके खिलाफ खड़ा न हो पाया तो क्या आज अपने बच्चो के खिलाफ कुछ बोल पाउँगा? मेरे लिए तो यही बहुत बहादुरी कि बात है कि मैं उनके सामने ये प्रस्ताव रख पाया। 

बड़ी बहु अपना सामान पैक कर रही है, शायद मायके जाने के लिए। बेटी और दामाद ने रिश्ता तोड़ने कि धमकी दे दी है। बेटी ने तो यहाँ तक कहा कि उसके ससुराल वाले देवतुल्य है जो इसके बाद भी उसे स्वीकार करेंगे। उसने अपने भविष्य में आने वाली सारी विपदाओं के लिए मुझे अभी से जिम्मेवार ठहरा दिया है। छोटा बेटा पहले से ही अमेरिका में सेटल होना चाहता था। शायद इस बात ने उसे एक कारण दे दिया है मुझसे मुंह मोड़ने के लिए। 

मैं कोशिश कर रहा था कि अपने निर्णय को गलत ठहराने के लिए शायद कुछ मिल जाये। पर मेरे दिमाग में जब आज से ३५ वर्ष पहले कोई वजह नहीं उपजी थी अपने परिवार के विरोध को सही ठहराने  की, तो आज कहा से कुछ मिल पाता। मैं अपने बच्चो पे आश्रित नहीं था, अतः मुझे उनके इशारो पे चलने कि कोई मज़बूरी नहीं थी। परन्तु ३५ वर्ष पहले भी तो ऐसी कोई मज़बूरी मेरे समक्ष नहीं थी। फिर भी मैंने वही किया जो मैं नहीं मेरा परिवार चाहता था। क्या आज़ भी मैं अपने लिए नहीं वरन बच्चो के लिए जीता रहूँ? क्या मेरी अपनी जिंदगी पहले माँ पिता और फिर बच्चो के लिए ही है? क्या मेरा अपने स्वयं के जीवन पर कोई अधिकार नहीं है?

विचार करते करते मुझे एक वजह मिली अपनी तत्कालीन स्थिति को ३५ वर्ष पूर्व कि स्थिति से अलग, और भी अधिक सही समझने की। तब मेरे ऊपर अपने माँ पिता का अनकहा ऋण था, जो हर संतान को चुकाना होता है। और आज मैं अपने बच्चो को किसी लायक बना चूका हूँ। उनके प्रति अपनी सारी जिम्मेवारियाँ निभा चूका हूँ। आज अगर मेरे किसी कार्य से उनकी इज्जत पे दाग लगता है तो उस इज्जत को बनाने में मेरा हाथ है। वो अगर चाहे तो अपनी इज्जत स्वयं बना ले, ऐसी इज्जत जो उनकी खुद कि हो, नाकि मुझसे मिली हुई। ऐसी इज्जत पर मेरे किसी कार्य से कुछ असर नहीं पड़ेगा। 

एक पल को मुझे लगा कि मानो मेरी दुविधा समाप्त हो गयी। परन्तु तभी मुझे अपने उन मित्रो और दूर के रिश्तेदारो कि आवाज़े गूंजने लगी। 

"यार तुम को नाक कटवा के ही दम लोगे।"

"ऐसा क्या है उसमे जो शादी ही करनी है? रिश्ता बनाना चाहते हो तो शादी कि क्या जरुरत है?"

"भाई, मेरे परिवार ने तो मना कर दिया है अब तुमसे कोई भी जान पहचान रखने को।"

"भइया, अब इस उमर में ससुराल वालो से ताने सुनवाओगे? एक पैसे कि न रह जायेगी हमारी इज्जत।"

"मोहल्ले के लोग थूकेंगे तुमपर, तुम्हारे अपने बच्चो का जीना मुश्किल हो जायेगा। क्यों अपने मुंह पे कालिख पुतवाना चाहते हो?"

क्यों थूकेंगे मोहल्ले वाले? क्या बिगाड़ा है मैंने उनका? क्या शादी करना गुनाह है? क्या एक उम्रदराज़ इंसान को अपने उम्र कि महिला से शादी करने के लिए पूरे समाज कि इज़ाज़त लेनी होगी? पर क्यों मुश्किल होगा मेरे बच्चो और रिश्तेदारो का जीना? मेरे शादी करने से उनका क्या सरोकार है? अगर ये गलत भी है तो ये मेरी गलती है, इस गलती से उनका क्या लेना देना हैं? मानो मेरे सब्र का बांध टूट गया था, और मन के कोने में ३५ वर्षो से दबे हुए उदगार आज मेरे मन मष्तिष्क पर काबू होना चाहते थे। उन्हें शायद लगा कि आज मैं वो गलती न दोहराउ जो ३५ वर्ष पूर्व की थी। एक बार मुझे भी ऐसा प्रतीत हुआ की मेरे अंदर एक नया जोश उत्पन्न हुआ है, और मैं अपने परिवार, अपने समाज और अपने रिश्तेदारो का सामना कर पाउँगा। 

परन्तु, ये जोश थोड़ी ही देर में वास्तविकता के छींटो से वैसे ही बैठ गया जैसे उबलते हुए चाय में किसी ने ठन्डे पानी कि कुछ बुँदे डाल दी हो। जैसे जैसे वक़्त गुज़रता गया, मेरे अपने अरमान मेरे ह्रदय के एक कोने में सिमटते गए। धीरे धीरे रात गुजर गयी, सुबह कि पहली किरण आते आते, मैं अपने ३५ वर्ष पुराने अरमानो को शायद इतना गहरा दफ़न कर चूका था, कि शायद अब वो कभी सर नहीं उठा पाये। 

मैं उठा और थके कदमो से बड़े बेटे के कमरे की ऒर चल दिया, उसे ये बताने की अब बहु को मायके जाने कि जरुरत नहीं है। शायद यही सही भी था, कौन जाने। 

- Binay Kumar Pandey, 9th March 2014, Mumbai, India

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