Sunday, 16 March 2014

भोर का तारा - कविता (Bhor Ka Tara, a poem)

भोर का तारा, प्रतिक है समाप्त होती रात्रि का।
आने वाली सुबह का, नए दिन की शुरुआत का।
जो लगभग समाप्त हो गया, उस अँधियारे युग का।
एक आशा भरी नयी शुरुआत, नए प्रारंभ का।
जीवन के आकाश पर जल्द ही बिखरने वाली नयी उम्मीदों का।





हृदय में उभरने वाले नए विचारों, नयी भावनाओं का।
पथ प्रदर्शक हो मानो, रात्रि को घर की राह दिखाने का।
अपने जीवन में ढूँढ़े हम भी एक भोर का तारा,
जो साधन हो एक नयी शुरुआत नयी उम्मीद लाने का।
हमारे जीवन से अँधियारा मिटाने और प्रकाश लाने का।
कहाँ मिलेगा ऐसा भोर का तारा? कहाँ खोजू उसे?
क्या अपने अंतर्मन में? या सहारा लू किसी और का।
ज्यों भोर का तारा आकाश में रात्रि और सुबह की कड़ी है,
मुझे ऐसे विचार चाहिए, दृढ़ संकल्प चाहिए,
जो करे कार्य भोर का उजाला मेरे जीवन में बिखेरने का।
और दूर करे मेरे जीवन के अँधेरे को,
पथ प्रदर्शक बनकर सच्चरित्र जीवन की राह दिखाने का।
अगर न मिला तो जगाऊँगा, उत्पन्न करूँगा ऐसे विचारों को,
अपने हृदय के अंदर, उम्मीदों की किरण फैलेगी,
नाम दूँगा जिसे मैं अपने भोर के तारे का।



- विनय कुमार पाण्डेय
16 मार्च 2014

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