Wednesday, 15 October 2014

चुनाव (Election - a short story in hindi)

आज चुनाव का दिन है। पिछले कुछ हफ़्तों से कान पक गए है चुनाव प्रचार सुन सुन कर। ढेरों पार्टियाँ और उतने ही ढेर सारी उनके वादे। ऐसा लगता है मानो सभी संकल्प लिए है देश में राम राज्य लाने के लिए। सब अपने को एक दूसरे से अच्छा साबित करने पर तुले है। इस प्रक्रिया में और कुछ हो ना हो, एक दूसरे की पोल जरूर खोल रहे हैं।

मुझे आज काम पर भी जाना है। भले ही मैनेजर ने आज वोट देने के लिए थोड़ा देर से आने की अनुमति दे दी है, परंतु मैं भली भाँति जानता हूँ की देर से जाने पर शाम को देर तक बैठना ही पड़ेगा। मुझे वोट देने का कोई शौक नहीं है। परंतु पिछले कुछ दिनों से हमारे मुहल्ले के नौजवानों ने एक मुहिम चलाई थी, जिसके जरिए वो वोट देने के लिए लोगो को समझा रहे थे। पहले तो लगा कि ये किसी पार्टी के लिए प्रचार कर रहे है। आखिरकार आदत नहीं रही किसी को निःस्वार्थ कुछ करते देखने की। परंतु जब उनकी बातें सुनी और आग्रह कर के बैठने पर मजबूर करने के बाद उनका नुक्कड़ नाटक भी देखा तो एहसास हुआ की चुनाव में हिस्सा ना लेकर गलती करूँगा। उन नौजवानों को मैंने मन ही मन धन्यवाद किया और जैसा की उन्होंने समझाया था, किसी पार्टी को वोट ना देकर अच्छे उम्मीदवार को वोट देने का निश्चय किया।

फिर अपने इलाके के उम्मीदवारों के बारे में पूरी जानकारी निकाली। बहुत सोचने के बाद एक उम्मीदवार पसंद आया। अख़बारों के अनुसार इस बार काँटे की टक्कर थी उस उम्मीदवार की एक बड़ी पार्टी के उम्मीदवार के साथ। बड़ी पार्टी के उम्मीदवार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप थे, परंतु यहाँ की जनता में जातिवाद के चलते उसके जीतने की पूरी संभावना थी। परंतु जिस उम्मीदवार को मैंने पसंद किया था, वो भी कुछ कम नहीं था। उनकी ईमानदारी और साफ़गोई की वजह से लोग उन्हें बहुत पसंद करते थे। पेशे से एक शिक्षक होने की वजह से उनकी इज्ज़त भी बहुत थी। अब देखना यह था कि ईमानदारी जीतती है या जातिवाद।


सुबह सवेरे तैयार होकर निकला और बूथ की तरफ चल दिया वोट देने को। आज पहली बार वोट देने जा रहा था। अंदर से एक एहसास था कि कुछ अच्छा करने जा रहा हूँ। कुछ उस तरह का एहसास जो मंदिर जाते वक़्त होता है। परंतु जब बूथ पर पहुँचा तो पैरो तले ज़मीन निकल गयी। इतनी लंबी कतार लगी थी मानो गर्मियों की छुट्टियों से पहले रेल की टिकटों के लिए कतार हो। ऐसा लग रहा था की पूरा शहर वही वोट देने पहुँच गया है।
मैंने घड़ी देखी, फिर उस लंबी कतार को देखा। मन ही मन विचार करना शुरू किया। “अगर ऑफिस देर से भी पहुँचा तो क्या हुआ, आखिर आज तो सबको कहा गया है वोट देकर आने के लिए। आज तो मेरा मैनेजर भी कुछ नहीं कह सकता।” फिर अपने मैनेजर का ख्याल आते ही मन में आवाज़ उठी - “क्या सच में मैनेजर कुछ नहीं कहेगा? क्या वो ताने नहीं मारेगा की जान बूझ कर देरी की है मैंने? दूसरों का उदाहरण देते हुए बताएगा की कैसे उन लोगों को वोट देकर आने में कोई देर नहीं हुई और मैं जानबूझकर देर से आया”

यह तय था कि कतार में लगने पर कम से कम एक घंटा तो लगना ही था। फिर ऑफिस पहुँचने में आधा घंटा और। मतलब मैनेजर के कोप का भाजन बनना तय था। फिर क्या था, पूरी तरह से स्वार्थी होकर सोचते वक़्त देश का ख्याल कहा आता है? तब तो कई तरह के बहाने आने लगते है दिमाग में। “मेरे एक वोट से क्या हो जाएगा? जहाँ इतने लोग वोट कर रहे है, एक वोट नहीं पड़ा तो क्या फर्क पड़ेगा? यही ठीक है, बेवजह के वोट के लिए मैनेजर के कोप का भाजन क्यों बनना? वैसे भी जिसे मैं वोट देना चाहता हु, उसे जीतना कहा है? जातिवाद के चलते उसका विरोधी आराम से जीत जाएगा। कोई फ़ायदा नहीं है यहाँ समय बर्बाद करके।”

जब आप पूर्ण रूप से किसी कार्य के लिए तैयार नहीं हो, सिर्फ कुछ लोगों के कहने भर से वो कार्य करने जा रहे हो, तब आपका अंतर्मन किसी बहाने की खोज में रहता है। आज भी वही स्थिति थी। हमेशा किसी ना किसी बहाने से वोट नहीं देने के बाद आज बूथ पर पहुँचने पर छोटी मोटी बाधाएँ भी बड़ी लग रही थी। ऐसा लग रहा था कि किसी जंजाल में फँस गया हूँ। फिर हमेशा की तरह मेरे अंतर्मन ने मुझे समझा दिया की मेरे एक वोट देने से देश को तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, परंतु मुझे अवश्य ऑफिस में परेशानी होगी। अब शायद मैं स्वार्थी ज्यादा था या देशभक्त कम था, ये तो पता नहीं, पर वोट दिए बिना ऑफिस जाते वक़्त कोई ग्लानि या दुःख अनुभव नहीं हुआ।

ऑफिस में समय पर पहुँच कर मुझे ये अहसास हुआ कि मेरा निर्णय कितना सही था। मेरे काफी सहयोगी बिना वोट दिए ऑफिस पहुँच चुके थे। यह तय था कि अगर मैं देर से आता तो मैं शायद इकलौता कर्मचारी होता अपने मैनेजर के कोप भाजन के लिए। अंदर से एक राहत महसूस की और जो हल्की सी विचारधारा मन के किसी कोने में बैठी कह रही थी कि मुझे वोट करना चाहिए, उसे पूरी तरह से दबा दिया।

ऐसा नहीं है कि ऑफिस में किसी ने वोट नहीं दिया। चार ऐसे लोग भी थे जिन्होंने अपने जाति वाले भ्रष्ट उम्मीदवार को वोट दिया था। शायद जातिवाद की जड़े इतनी कमज़ोर नहीं थी कि भ्रष्टाचार उसे उखाड़ फेंके। और फिर मुझे मिलाकर 13 ऐसे लोग भी थे जो ईमानदार और सच्चे उम्मीदवार को पसंद करते थे, परंतु वोट नहीं कर पाए। अपने ऑफिस के इन आंकड़ों को देखकर मुझे यकीन हो गया कि वोट नहीं देने का मेरा फ़ैसला सही था। मेरा वोट वैसे भी बेकार जाने वाला था। शाम को घर लौटते वक़्त मेरे अंदर कही भी किसी तरह की ग्लानि या मलाल नहीं था। ज़िंदगी अपने पुराने ढर्रे पर चल निकली थी।

एक सप्ताह के बाद चुनाव के नतीजे प्रकाशित हुयें। जातिवाद एवं भ्रष्टाचार ने सच्चाई और ईमानदारी को सिर्फ 10 वोटों से हरा दिया था।

विनय कुमार पाण्डेय (22 अप्रैल से 27 अप्रैल)
Binay Kumar Pandey (22 April to 27 April)

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