Skip to main content

Posts

उम्मीद (Hope - a poem related to Indian Election 2014)

उम्मीद उनसे करे जो इंसान हो, इंसानियत के दुश्मनों से क्या उम्मीद करना। जिन हाथों ने ख़ुद चमन उजाड़ा है, उन हाथों से शहर बसाने की क्या उम्मीद करना। जो हवा आग की लपटों को और बढ़ाती हो, उस हवा से बादलों को लाने की क्या उम्मीद करना। उम्मीदों पर पानी फेर कर 49 दिनों में भाग लिए, आप पर अब और क्या उम्मीद करना। 10 सालों तक सिर्फ़ उम्मीद दिलाने वालों, अबकी बार हमसे भी न कुछ उम्मीद करना। सांप्रदायिकता भरी नफरत का सौदागर जिसका सरदार हो, उनसे अमन शांति की क्या उम्मीद करना। बंदर बाट जिनका रोज का काम हो, ऐसे तीसरे मोर्चे से भी क्या उम्मीद करना। गर लाना है राम राज्य, सुधारना है अपना समाज, तो दूसरों पर क्या उम्मीद करना। अब जो करना है हमें ख़ुद ही करना है, गर करना है तो ख़ुद से ही उम्मीद करना। - विनय कुमार पाण्डेय - 19 अप्रैल 2014

इंतकाम (Hindi short story)

आज उसे सामने देखकर आक्रोश नहीं दया आ रही थी। जिस सजा के वो काबिल था, किस्मत ने उसे और बड़ी सजा दे डाली थी। शायद मेरे जैसे और भी बहुत थे जिनकी बद्दुआ ने उसे उसकी आज की स्थिति तक पहुँचाया था। कभी वह कॉलेज का सबसे खतरनाक लड़का था, जिससे सभी डरते थे। उसकी हर बात हमारे लिए आदेश होता था। हर साल रैगिंग के नाम पर मुझ जैसे नए लड़कों का यौन उत्पीड़न करना, हमेशा हमसे पैसे या अगर हमारी कोई चीज पसंद आ जाए तो ले लेना। हमने सबकुछ चुपचाप सहा और जैसे तैसे करके अपनी पढ़ाई पूरी की। ऐसा लगता था की जीवन में फिर कभी उसकी सूरत नहीं देखनी पड़ेगी। किंतु किस्मत को कुछ और मंज़ूर था। पिछले आठ महीनों की मेहनत के बाद जब मैंने उसे खोज निकाला तो मेरे मन में सिर्फ़ एक ही ख्याल था - उसकी मौत। मेरे हिसाब से मौत भी उसके गुनाहों के लिए छोटी सजा थी। पर आज उसकी हालत देखकर मुझे लगा की किस्मत ने उसके पापों की सजा सच में मौत से भी बदतर तय की है। मैं वहाँ उसे उसकी इंच दर इंच मौत की और बढती हालत में छोड़ आया। मुझे यकीन था की मेरी पत्नी भी इसका समर्थन करेगी और इसे अपने साथ कॉलेज में हुए यौन उत्पीड़न का सही इंतकाम म...

मुझे होली अच्छी लगती हैं (Hindi Story by me)

मुझे होली अच्छी लगती है। आज होलिका दहन है। मुझे तो ये भी नहीं पता की होलिका दहन क्या होता है। बस मुंबई की एक सोसाइटी से दूसरी सोसाइटी घूम घूम कर प्रसाद से पेट भरने में लगा हूँ। लोगो को कहते हुए सुना की ये जो आग लगा कर उसकी पूजा करते है, उसे होलिका दहन कहते है। अधिकतर लोग तो आजकल शायद अँग्रेज़ी में ही आपस में बातें करते है, इसलिए कुछ समझ नहीं आता। परंतु अभी भी कुछ लोग है, जो शायद पूरी तरह से अँग्रेज़ी ना बोल पाने की वजह से हिंदी में बातें करते है। वो लोग भी बीच बीच में कुछ शब्द अँग्रेज़ी के जोड़ ही देते है। उनकी आधी अधूरी बातों से मुझे होलिका दहन के बारे में पता चला। नहीं तो मुझ जैसे बस्ती में पैदा हुए और 10 वर्षों से वहाँ की गलियों में कभी खेलते कभी छोटा मोटा काम करते और कभी भीख माँगते गुजरी ज़िंदगी में ऐसी बातों का पता चलना मुश्किल होता है। कभी स्कूल नहीं गया, इसलिए सीखी है तो सिर्फ़ तरह तरह की गालियाँ। जबसे होश सम्हाला है, हर किसी को बिना वजह मेरी माँ बहन से रिश्ता जोड़ते हुए सुना है। लोगो के मुंह से अपना नाम कम सुना है, माँ बहन वाले अलंकार अधिक। मैं भी कहा अतीत में भटक गया। जैसा...

भोर का तारा - कविता (Bhor Ka Tara, a poem)

भोर का तारा, प्रतिक है समाप्त होती रात्रि का। आने वाली सुबह का, नए दिन की शुरुआत का। जो लगभग समाप्त हो गया, उस अँधियारे युग का। एक आशा भरी नयी शुरुआत, नए प्रारंभ का। जीवन के आकाश पर जल्द ही बिखरने वाली नयी उम्मीदों का।

दुविधा (Hindi Story)

आज फिर से उसी दुविधा में खड़ा था मैं। ना जाने क्यों, ऐसा लगता था कि समय फिर से लौट आया है।  अगर मैं अपने बच्चो कि बात मान लेता तो ये उसके साथ किया हुआ मेरा दूसरा अन्याय होता। एक बार ऐसे ही अपने परिवार कि खातिर मैं उसके अरमानो कि बलि चढ़ा चुका था। पर फिर से उसे दोहराने कि मेरी कोई मंशा नहीं थी। आज फिर से वही प्रश्न खड़ा हुआ था।  परिवार कि मान मर्यादा, समाज का भय, बच्चो कि इज्जत कि चिंता, लोगो के ताने कसने का भय इत्यादि। पर मन अपने एक कोने से बार बार आवाज दे रहा था। "कब तक? कब तक इन खोखली बातो के प्रपंच में आकर तुम अपने ह्रदय कि नहीं सुनोगे? भाग्य ने एक और मौका दिया है अपनी पिछली भूल सुधरने का, क्या इस मौके को भी यु हीं गवा दोगे?" जिस प्रश्न का ऊत्तर मेरे पास आज से 35 वर्ष पूर्व नहीं था, आज कैसे होता? तब माता पिता का दबाव था, आज अपने ही बच्चो का। मेरे कानो में उनकी कही बाते गूंजने लगी। 

Sholay, one more time!

I wish you a very happy new year 2014. I watched Sholay 3D today, and decided to write my first post of 2014 about this movie. We all know Sholay! We have been knowing Sholay since its release or since we came to senses, whichever is later. Nothing new can be written about Sholay. We have been watching it, reading about it, discussing it, saying it all these years! I don’t think we can even remember how many times we have seen this movie. So, what would I write in a review of this movie? Just one line: GO AND RELIVE THE MAGIC OF SHOLAY IN THEATERS… AGAIN!!!!

The price he paid for his values

L K Advani, the leader who once was biggest name, and symbol of BJP, has been sidelined by his own party, to cater to a leader, who according to BJP, will ensure victory in next election.  Advani is a victim here, but not many people see him that way, and it may be projected as he is greedy of his own ambition of becoming Prime Minister of India. We have to understand, that when it was time, when destiny called him to declare himself the leader of World’s largest democracy, in 1995, he himself nominated Atal Behari Vajpayee as party’s PM candidate. He was the preferred choice of the nation at that time, and the party wanted his leadership, like they are now after Narendra Modi. But, his inner voice, discipline, respect for seniority of Atalji, made him defer to Vajpayee, his political senior. At that time, many people told him, that he is throwing away possibly the only shot at the top chair of country. He may not get such chance again, and once Vajpayee becomes PM, Advani...