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PK – The story behind the story!

I have seen the movie, and saw various comments on social media as well as news for both in support as well as against this movie. One group is claiming that the movie is showing Hindu religion in bad light, whereas another group that it shows true color of people taking advantage in the name of religion. I think both are completely wrong, and they have not understood the movie. I would encourage them to watch the movie again, and if they go after reading this post, it will help them understand the true story of PK.  God works in mysterious ways. God helps who trust God with the core of their heart. You can’t just perform some rituals and expect God to fulfill your wishes. You have to have faith in God. And your faith should not be selfish that if your wish is delayed, then you start questioning God. When you show true faith and devotion, God comes to you, show you the right path. Now all you have to do is walk on that path. This is exactly what PK story is all ...

अलविदा....

"अपना ख्याल रखना।" यही शब्द निकल पाए थे उसके मुख से। कहना तो वह बहुत कुछ चाहता था. परंतु वो सब बातें उसके हृदय में ही रह गयी। वह जनता था की शायद यह उनकी आख़िरी मुलाकात हो। परंतु हालात ऐसे हो चुके थे कि उनके मध्य अलगाव अवश्यंभावी हो चूका था।  "तुम भी" बस इतना ही कह पाई वह उत्तर में। उसके मन में भी ढेर सारी बातें घुमड़ रही थी। परंतु शायद दोनों के लिए हृदय से मुख का मार्ग बहुत दुर्गम हो चला था। उस मार्ग में उनके अहम ने कई रुकावटें पैदा कर दी थी। 

साई बाबा के दर्शन

पिछले दिनों मैं शिर्डी होकर आया. मेरे माता पिता यहाँ मुंबई आए हैं. उनको साथ लेकर हम सपरिवार शिर्डी गए थे. कार्यक्रम कुछ ऐसा बनाया की शनिवार सुबह निकालेंगे, रास्ते में नाशिक पड़ता है, वहाँ पर त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर, आगे शिर्डी जाएँगे. शिर्डी में हमने रात्रि विश्राम करने का सोचा था. फिर सुबह शनि सिग्नापुर होकर वापस मुंबई आने वाले थे. उम्मीद थी की इस तरह से दर्शन भी हो जाएँगे और अधिक भाग दौड़ भी नहीं होगी. 

एक पेड़ की चाह

मैं एक पेड़ हूँ। एक सुखा हुआ पेड़। आज अपनी आख़िरी घड़ियाँ गिनता हुआ इंतज़ार कर रहा हूँ आपने आख़िरी कर्तव्य के लिए। पहले शायद कुछ रहे हो, पर अब मेरे कुछ अरमान नहीं है। परंतु जब तलक जान बाकी है, कही ना कहीं कोई जिज्ञासा या लालसा घेर ही लेती है। आज भी मेरे मन में बार बार ये विचार आता हैं, की शायद अब मेरे जीवन में सिर्फ़ कट कर अग्नि के हवाले होना बाकी है। अग्नि प्रवेश कहाँ होगा! क्या मैं किसी गरीब के घर चूल्हे में जलकर उसके परिवार को भोजन देने का माध्यम बनूँगा? या किसी निर्दयी शिकारी के शिकार को पकाने के लिए जलूँगा। शायद गरीब मजदूरो के अलाव में जलकर उन्हें कड़ाके की ठंड से बचाऊँगा, या शायद किसी धनाढ्य के घर पर आतिशदान में जलते जलते उनकी एक दूसरे के प्रति हृदय में ईष्या रखते हुए मित्रता का ढोंग देखूँगा। शायद किसी के जीवन की अंतिम यात्रा का माध्यम बनते हुए चिता में जलूँगा या एक नए युग की शुरुआत की क्रांति के प्रतिक के रूप में मशाल बनकर जलूँगा।

Interstellar – The story behind the story!

I have to admit, when I came out of this movie, I was confused, and thinking hard to find a logical sense to the story. One thought which came to my mind was that my thinking ability is of 3 dimensions and that’s the reason I am not able to logically conclude this 5 dimension story. But few hours later, and few brainstorming sessions with myself, I came up with a somewhat logical explanation on what could have happened in the background, not shown to us, but may have leads to this story-line.  Here, in this story behind the story of Interstellar, I am presenting the story which may have happened in the normal timeline, without the event shown in the movie. These timelines will lead to a situation where the movie would have started. Read on, to check what has happened in the actual timeline. 

कर्मठता (A short story in Hindi)

" रामलाल , मैं पिछले तीन दिनों से देख रहा हूँ , तुम बारिश में भी आकर गाड़ियाँ धोते पोंछते हो। बारिश में गाड़ी पोंछी या नहीं , किसने देखा है ?" " बाबू साहब , ये मेरा काम है। अगर बहाने ही बनाने है तो बारिश क्या और धूप क्या। कोई और देखे या ना देखे , मेरी अंतरात्मा देख रही होगी , मेरा ईश्वर देख रहा होगा। ऐसे में मैं अपने काम में कोताही कैसे बरत सकता हु ?" रामलाल की कर्मठता ने मुझे झकझोर के रख दिया जिसने अभी अभी ऑफिस फ़ोन करके बारिश के बहाने से आज की छुट्टी की थी। विनय कुमार पाण्डेय 13 J uly 2014

चुनाव (Election - a short story in hindi)

आज चुनाव का दिन है। पिछले कुछ हफ़्तों से कान पक गए है चुनाव प्रचार सुन सुन कर। ढेरों पार्टियाँ और उतने ही ढेर सारी उनके वादे। ऐसा लगता है मानो सभी संकल्प लिए है देश में राम राज्य लाने के लिए। सब अपने को एक दूसरे से अच्छा साबित करने पर तुले है। इस प्रक्रिया में और कुछ हो ना हो, एक दूसरे की पोल जरूर खोल रहे हैं। मुझे आज काम पर भी जाना है। भले ही मैनेजर ने आज वोट देने के लिए थोड़ा देर से आने की अनुमति दे दी है, परंतु मैं भली भाँति जानता हूँ की देर से जाने पर शाम को देर तक बैठना ही पड़ेगा। मुझे वोट देने का कोई शौक नहीं है। परंतु पिछले कुछ दिनों से हमारे मुहल्ले के नौजवानों ने एक मुहिम चलाई थी, जिसके जरिए वो वोट देने के लिए लोगो को समझा रहे थे। पहले तो लगा कि ये किसी पार्टी के लिए प्रचार कर रहे है। आखिरकार आदत नहीं रही किसी को निःस्वार्थ कुछ करते देखने की। परंतु जब उनकी बातें सुनी और आग्रह कर के बैठने पर मजबूर करने के बाद उनका नुक्कड़ नाटक भी देखा तो एहसास हुआ की चुनाव में हिस्सा ना लेकर गलती करूँगा। उन नौजवानों को मैंने मन ही मन धन्यवाद किया और जैसा की उन्होंने समझाया था, किसी पार्...